दत्तात्रेय जयंती व्रत कथा 2026
दत्तात्रेय जयंती
दत्तात्रेय जयंती को दत्त जयंती भी कहा जाता है, इस दिन भगवान दत्तात्र्य (दत्त) के जन्मदिन को मनाते है.भगवान दत्तात्र्य सर्वशक्तिमान त्रिमूर्ति, ब्रह्मा, विष्णु और शिव का एक संयुक्त रूप है। हिंदु कैलेंडर के अनुसार मार्गशिर्ष महीने की पूर्णिमा पर मनाया जाता है। दत्तात्रेय जयंती मुख्य रूप से महाराष्ट्र में मनाई जाती है। भक्तों का मानना है कि वे दत्तात्रेय जयंती पर पूजा करते हुए जीवन के सभी पहलुओं में लाभ पाते हैं लेकिन इस दिन का मुख्य महत्व यह है कि यह व्यक्तियों के पितृ मुद्दों से रक्षा करता है।
दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं इसीलिए उन्हें ‘परब्रह्म मूर्ति सद्गुरु’ और ‘श्री गुरु देव दत्त’ भी कहा जाता हैं। भगवान दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है।
दत्तात्रेय जयंती 2026 | Dattatreya Jayanti 2026
Wednesday, December 23, 2026.
Purnima Tithi Begins – 10:47 AM on Dec 23, 2026.
Purnima Tithi Ends – 06:57 AM
दत्तात्रेय जयंती पूजा मुहूर्त
दत्तात्रेय जयंती व्रत विधि
- दत्तात्रेय जयंती के दिन उपवास करना चाहिए
- सुबह जल्दी स्नानं करके भगवान् दत्तात्रेय की पूजा करनी चाहिए
- भगवान् दत्तात्रेय को दीप, धुप, चन्दन, हल्दी, मिठाई, फल, फूल अर्पित करना चाहिए
- भगवान् दत्तात्रेय की सात परिक्रमा करनी चाहिए
- शाम के समय भगवान् दत्तात्रेय स्रोत्र और मंत्र का जाप करना चाहिए
दत्तात्रेय जयंती कथा | Dattatreya Jayanti Katha
धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार तीनों देवियों पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री जी को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत घमण्ड होता है अत: नारद जी को जब इनके घमण्ड के बारे में पता चला तो वह इनका घमण्ड चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों की परीक्षा लेते हैं जिसके परिणाम स्वरूप दत्तात्रेय का प्रादुर्भाव होता है.
नारद जी देवियों का गर्व चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों के पास जाते हैं और देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करते हैं. लगे. देवी ईर्ष्या से भर उठी और नारद जी के जाने के पश्चात भगवान शंकर से अनुसूया का सतीत्व भंग करने की जिद करने लगी. सर्वप्रथम नारद जी पार्वती जी के पास पहुंचे और अत्रि ऋषि की पत्नी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करने लगे.
देवीयों को सती अनुसूया की प्रशंसा सुनना कतई भी रास नहीं आया. घमण्ड के कारण वह जलने-भुनने लगी. नारद जी के चले जाने के बाद वह देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म को भंग करने की बात करने लगी. ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों को अपनी पत्नियो के सामने हार माननी पडी़ और वह तीनों ही देवी अनुसूया की कुटिया के सामने एक साथ भिखारी के वेश में जाकर खडे़ हो गए. जब देवी अनुसूया इन्हें भिक्षा देने लगी तब इन्होंने भिक्षा लेने से मना कर दिया और भोजन करने की इच्छा प्रकट की.
देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई. लेकिन तीनों देवों ने भोजन करने से इन्कार करते हुए कहा कि जब तक आप नग्न होकर भोजन नहीं परोसेगी तब तक हम भोजन नहीं करेगें. देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी. लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनो की मंशा जान ली.
उसके बाद देवी ने ऋषि अत्रि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़क दिया. जल छिड़कते ही तीनों ने बालरुप धारण कर लिया. बालरुप में तीनों को भरपेट भोजन कराया. देवी अनुसूया उन्हें पालने में लिटाकर अपने प्रेम तथा वात्सल्य से उन्हें पालने लगी. धीरे-धीरे दिन बीतने लगे. जब काफी दिन बीतने पर भी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश घर नही लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिन्ता सताने लगी.
देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. वह तीनों ही माता अनुसूया से क्षमा मांगने लगी. तीनों ने उनके पतिव्रत धर्म के समक्ष अपना सिर झुकाया. माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरुप में ही रहना ही होगा. यह सुनकर तीनों देवों ने अपने – अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया. इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया. इनके तीन सिर तथा छ: हाथ बने. तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया.
दत्तात्रेय जयंती 2026
दत्तात्रेय मंत्र साधना
श्री दत्तात्रेय स्तोत्र
श्री दत्त आरती
