Mahishasura Mardini Stotra in Hindi Lyrics PDF | महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम्
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम्
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् क्या है?
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। यह स्तोत्र माँ दुर्गा के उस दिव्य स्वरूप की स्तुति करता है जिसने महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर का वध करके देवताओं और संसार की रक्षा की थी। इस स्तोत्र में देवी की शक्ति, वीरता, करुणा और धर्म की स्थापना के लिए किए गए कार्यों का सुंदर वर्णन मिलता है।
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् का पाठ शक्ति उपासना में विशेष महत्व रखता है और यह देवी भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।
माँ महिषासुर मर्दिनी के बारे में
महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा का एक पराक्रमी स्वरूप है। पुराणों के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति से माँ दुर्गा प्रकट हुईं और उन्होंने महिषासुर का संहार किया।
इसी विजय के कारण देवी को “महिषासुर मर्दिनी” अर्थात महिषासुर का नाश करने वाली कहा जाता है। वे धर्म, सत्य और न्याय की रक्षक मानी जाती हैं।
Mahishasura Mardini Stotra in Hindi Lyrics
महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
दकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् का महत्व
यह स्तोत्र केवल देवी की स्तुति नहीं बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है। इसका पाठ व्यक्ति के भीतर आत्मबल, साहस और सकारात्मक सोच को जागृत करने में सहायक माना जाता है।
शक्ति साधना, नवरात्रि पूजा और देवी उपासना में इस स्तोत्र का विशेष स्थान है। भक्त मानते हैं कि इसके नियमित पाठ से जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्राप्त होती है।
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् का अर्थ
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् का मूल उद्देश्य देवी दुर्गा की वीरता, शक्ति और दिव्य स्वरूप का गुणगान करना है। इसमें देवी द्वारा असुरों के विनाश और धर्म की रक्षा का वर्णन किया गया है।
यह स्तोत्र भक्त को यह संदेश देता है कि सत्य, साहस और धर्म की शक्ति अंततः हर प्रकार की नकारात्मकता और अन्याय पर विजय प्राप्त करती है।
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् कब पढ़ना चाहिए?
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन कुछ अवसर विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं:
शारदीय और चैत्र नवरात्रि
शुक्रवार के दिन
दुर्गा अष्टमी और महानवमी
शक्ति साधना के समय
महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ करने से पहले
जीवन में भय, तनाव या कठिनाइयों के समय
प्रातःकाल और संध्या का समय पाठ के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् कैसे पढ़ें?
इस स्तोत्र का पाठ करने की सरल विधि:
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थान पर देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
दीपक, धूप और पुष्प अर्पित करें।
कुछ क्षण देवी का ध्यान करें।
श्रद्धा और एकाग्रता के साथ स्तोत्र का पाठ करें।
पाठ के बाद देवी से आशीर्वाद और संरक्षण की प्रार्थना करें।
अंत में आरती और प्रसाद अर्पित करें।
भक्ति और विश्वास के साथ किया गया पाठ सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् के लाभ
इस स्तोत्र के नियमित पाठ से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् देवी दुर्गा की शक्ति और विजय का दिव्य स्तोत्र है। इसका नियमित पाठ भक्त के जीवन में साहस, आत्मबल, सकारात्मकता और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है। श्रद्धा और समर्पण के साथ किया गया यह पाठ माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का एक श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
1. What is Mahishasura Mardini Stotram?
Mahishasura Mardini Stotram is a devotional Sanskrit hymn that glorifies Goddess Durga as the destroyer of the demon Mahishasura.
2. Who is Mahishasura Mardini?
Mahishasura Mardini is a powerful form of Goddess Durga who defeated and destroyed the demon Mahishasura to restore righteousness.
3. When should Mahishasura Mardini Stotram be recited?
It is commonly recited during Navratri, on Fridays, Durga Ashtami, Navami, and during periods of spiritual practice and devotion.
4. How do you chant Mahishasura Mardini Stotram?
After cleansing yourself and preparing a peaceful prayer space, chant the stotram with concentration, devotion, and respect for Goddess Durga.
5. What are the benefits of reciting Mahishasura Mardini Stotram?
The stotram is believed to promote courage, confidence, inner strength, mental peace, spiritual growth, and protection from negativity.
6. Why is Mahishasura Mardini Stotram important?
It symbolizes the victory of good over evil and inspires devotees to overcome challenges with faith and determination.
7. Can beginners recite Mahishasura Mardini Stotram?
Yes. Anyone can recite it with devotion, regardless of their level of spiritual knowledge or experience.
8. Is daily recitation of Mahishasura Mardini Stotram beneficial?
Yes. Daily recitation is considered auspicious and is believed to attract divine blessings, positivity, and spiritual strength.
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