श्री दत्त आरती: त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा, पूजा विधि, अर्थ और महत्त्व
आरती है। “त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा” से आरंभ होने वाली यह आरती विशेष रूप से
महाराष्ट्र और दत्त संप्रदाय से जुड़े भक्तों में प्रचलित है।भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त दिव्य शक्ति का स्वरूप माना जाता है।
भक्त श्रद्धापूर्वक उनकी आरती करके ज्ञान, सद्बुद्धि, गुरु-कृपा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की
प्रार्थना करते हैं।
श्री दत्त आरती प्रतिदिन की पूजा, गुरुवार, पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा, दत्त जयंती तथा
दत्त मंदिरों में आयोजित विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के समय गाई जा सकती है।
श्री दत्त आरती का संपूर्ण पाठ
त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा।
त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्यराणा।
नेती नेती शब्द न ये अनुमाना।
सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना॥१॥
जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता॥धृ॥
सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त।
अभाग्यासी कैची कळेल ही मात।
पराही परतली तेथे कैचा हा हेत।
जन्ममरणाचाही पुरलासे अंत॥२॥
जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता॥
दत्त येऊनिया उभा ठाकला।
भावे साष्टांगे प्रणिपात केला।
प्रसन्न होऊनि आशीर्वाद दिधला।
जन्ममरणाचा फेरा चुकविला॥३॥
जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता॥
दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान।
हरपले मन झाले उन्मन।
मी तू पणाची झाली बोळवण।
एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान॥४॥
जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता॥
नोट: यह आरती मूल रूप से मराठी भाषा में प्रचलित है। अलग-अलग मंदिरों,
क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में कुछ शब्दों के उच्चारण या लेखन में छोटा अंतर मिल सकता है।
श्री दत्त आरती का हिंदी भावार्थ
प्रथम पद का भावार्थ
भगवान दत्तात्रेय तीनों गुणों—सत्त्व, रज और तम—से संबंधित त्रिमूर्ति स्वरूप हैं।
उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त शक्ति के रूप में देखा जाता है। उनके वास्तविक
स्वरूप का वर्णन केवल शब्दों द्वारा नहीं किया जा सकता। देवता, ऋषि, मुनि और योगी भी
समाधि में उनके पूर्ण स्वरूप को समझने में असमर्थ रहते हैं।
आरती के मुखड़े का भावार्थ
भक्त श्री गुरुदत्त की जय-जयकार करता है और कहता है कि श्रद्धापूर्वक उनकी आरती करने से
संसार से जुड़ी चिंताएँ कम होती हैं। उनका स्मरण मन को शांति और आध्यात्मिक सहारा प्रदान
करता है।
द्वितीय पद का भावार्थ
भगवान दत्त बाहरी संसार और प्रत्येक जीव के अंतर्मन में समान रूप से उपस्थित हैं।
उनका यह सर्वव्यापी स्वरूप केवल श्रद्धा, साधना और गुरु-कृपा से समझा जा सकता है।
जहाँ मन और वाणी की सीमा समाप्त हो जाती है, वहाँ दत्त का परम स्वरूप अनुभव होता है।
तृतीय पद का भावार्थ
भक्त भावपूर्वक भगवान दत्त के सामने साष्टांग प्रणाम करता है। भगवान प्रसन्न होकर उसे
आशीर्वाद देते हैं और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। यहाँ जन्म-मरण के चक्र से
मुक्ति की कामना व्यक्त की गई है।
चतुर्थ पद का भावार्थ
निरंतर “दत्त-दत्त” नाम का ध्यान करते हुए भक्त का मन सांसारिक विचारों से ऊपर उठने लगता है।
उसके भीतर का अहंकार और “मैं-तुम” का भेद समाप्त होने लगता है। अंत में भक्त का चित्त पूरी
तरह श्री दत्त के ध्यान में लीन हो जाता है।
भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
भगवान दत्तात्रेय को हिंदू धार्मिक परंपरा में गुरु-तत्त्व और ज्ञान का दिव्य स्वरूप माना जाता है।
“दत्त” का अर्थ प्रदान किया हुआ और “आत्रेय” का अर्थ अत्रि ऋषि के पुत्र से संबंधित माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र हैं।
उनके स्वरूप में ब्रह्मा की सृजन शक्ति, भगवान विष्णु की पालन शक्ति और भगवान शिव की
संहार एवं वैराग्य शक्ति का समन्वय माना जाता है।
भगवान दत्तात्रेय को प्रायः तीन मुख, छह भुजाओं, चार कुत्तों और एक गाय के साथ दर्शाया जाता है।
विभिन्न परंपराओं में इन प्रतीकों के अलग-अलग आध्यात्मिक अर्थ बताए गए हैं।
दत्त परंपरा में श्रीपाद श्रीवल्लभ, श्री नरसिंह सरस्वती, श्री स्वामी समर्थ और शिरडी के
साई बाबा जैसे संतों को भी दत्त-तत्त्व से जोड़कर देखा जाता है।
श्री दत्त आरती के लिए आवश्यक पूजा सामग्री
भगवान दत्तात्रेय की पूजा और आरती में निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया जा सकता है:
- भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति या तस्वीर
- स्वच्छ पीला, सफेद या भगवा वस्त्र
- घी या शुद्ध तेल का दीपक
- कपास की बत्ती
- धूप, अगरबत्ती और कपूर
- चंदन या अष्टगंध
- कुमकुम और अक्षत
- पीले या सफेद पुष्प
- तुलसी के पत्ते
- जनेऊ
- नारियल और सुपारी
- फल और मिठाई
- दूध या दूध से बना सात्त्विक प्रसाद
- पंचामृत या शुद्ध जल
- आरती की थाली और घंटी
सभी सामग्री उपलब्ध न होने पर केवल दीपक, जल, पुष्प और श्रद्धा के साथ भी श्री दत्त आरती
की जा सकती है।
श्री दत्त पूजा और आरती विधि
1. पूजा स्थान की सफाई करें
पूजा शुरू करने से पहले घर के मंदिर और आसपास के स्थान को स्वच्छ करें। एक चौकी पर साफ
वस्त्र बिछाकर भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
2. स्नान और शुद्धि करें
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। स्नान संभव न हो तो हाथ, पैर और मुख धोकर शांत मन से
पूजा के लिए बैठें।
3. भगवान गणेश और गुरु का स्मरण करें
पूजा में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
इसके बाद अपने माता-पिता, कुलदेवता और गुरु को प्रणाम करें।
4. श्री दत्तात्रेय का ध्यान करें
आँखें बंद करके भगवान दत्तात्रेय के स्वरूप का ध्यान करें और मन में
“श्री गुरुदेव दत्त” मंत्र का जाप करें।
5. दीपक और धूप प्रज्वलित करें
भगवान के सामने घी या शुद्ध तेल का दीपक जलाएँ। इसके बाद धूप और अगरबत्ती अर्पित करें।
6. पूजन सामग्री अर्पित करें
भगवान दत्तात्रेय को चंदन, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और तुलसी अर्पित करें। मूर्ति की पूजा
करते समय परंपरा के अनुसार जल या पंचामृत से अभिषेक भी किया जा सकता है।
7. मंत्र-जप या स्तोत्र-पाठ करें
पूजा के दौरान “श्री गुरुदेव दत्त” मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप किया जा सकता है।
श्रद्धालु दत्त स्तोत्र, दत्त चालीसा, गुरुचरित्र या दत्त बावनी का पाठ भी कर सकते हैं।
8. नैवेद्य अर्पित करें
भगवान दत्तात्रेय को फल, मिठाई, गुड़, चना, दूध, खीर या घर में तैयार सात्त्विक भोजन
का भोग लगाएँ।
9. श्री दत्त आरती करें
आरती की थाली में दीपक या कपूर प्रज्वलित करें। भगवान के सामने आरती को घड़ी की दिशा
में घुमाते हुए “त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा” आरती गाएँ।
10. प्रार्थना और प्रसाद वितरण करें
आरती पूरी होने के बाद भगवान दत्तात्रेय से सद्बुद्धि, गुरु-कृपा और धर्म के मार्ग पर
चलने की शक्ति माँगें। इसके बाद प्रसाद परिवार और उपस्थित भक्तों में वितरित करें।
श्री दत्त आरती करने का शुभ समय
श्री दत्त आरती सुबह और शाम दोनों समय की जा सकती है। दैनिक पूजा में प्रातः स्नान के
बाद या सूर्यास्त के समय दीपक जलाकर आरती करना सुविधाजनक माना जाता है।
इन अवसरों पर भगवान दत्तात्रेय की आरती विशेष श्रद्धा से की जाती है:
- प्रत्येक गुरुवार
- दत्त जयंती
- मार्गशीर्ष पूर्णिमा
- गुरु पूर्णिमा
- पूर्णिमा और अमावस्या
- गुरुचरित्र पारायण की समाप्ति पर
- दत्त मंदिर में आयोजित भजन और कीर्तन के समय
- नए कार्य या आध्यात्मिक साधना के आरंभ पर
किसी विशेष समय पर पूजा करना संभव न हो तो भक्त अपनी सुविधा के अनुसार स्वच्छता और
श्रद्धा के साथ आरती कर सकते हैं।
श्री दत्त आरती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व
गुरु-तत्त्व का स्मरण
भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु के रूप में पूजा जाता है। उनकी आरती भक्त को गुरु के प्रति
श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण का भाव अपनाने की प्रेरणा देती है।
मन की एकाग्रता
आरती, मंत्र-जप और दीपक की ज्योति पर ध्यान केंद्रित करने से मन शांत और एकाग्र करने
में सहायता मिल सकती है।
अहंकार से मुक्ति की प्रेरणा
आरती में “मी तू पणाची झाली बोळवण” के माध्यम से मैं और तुम के भेद तथा अहंकार को
त्यागने का आध्यात्मिक संदेश दिया गया है।
ज्ञान और सद्बुद्धि की प्रार्थना
भगवान दत्तात्रेय की उपासना में भक्त सही निर्णय लेने की बुद्धि, ज्ञान और धर्म के मार्ग
पर चलने की प्रेरणा माँगता है।
सकारात्मक वातावरण
घर में नियमित रूप से दीपक, धूप, मंत्र-जप और आरती करने से भक्तिमय तथा शांत वातावरण
निर्मित होता है।
कठिन समय में आत्मबल
श्रद्धालु मानते हैं कि श्री दत्त का नाम-स्मरण कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विश्वास और
आत्मबल बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
आध्यात्मिक उन्नति
आरती का मुख्य भाव संसार की चिंता से ऊपर उठकर गुरु और परमात्मा के ध्यान में मन को
स्थिर करना है।
श्री दत्तात्रेय के सरल मंत्र
श्री दत्त नाम मंत्र
॥ श्री गुरुदेव दत्त ॥
यह भगवान दत्तात्रेय का अत्यंत सरल और प्रचलित नाम मंत्र है। इसका जाप पूजा, आरती,
यात्रा या दैनिक कार्यों के दौरान किया जा सकता है।
दत्तात्रेय ध्यान मंत्र
ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः॥
मंत्र-जप हमेशा श्रद्धा, शुद्ध भावना और अपनी पारिवारिक अथवा गुरु परंपरा के अनुसार करना चाहिए।
आरती के बाद श्री दत्त से प्रार्थना
हे श्री गुरुदत्त! हमारे मन से अहंकार, भय, अज्ञान और नकारात्मक विचारों को दूर करें।
हमें सद्बुद्धि, विवेक और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। हमारे माता-पिता,
गुरुजनों और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। हमें प्रत्येक जीव में परमात्मा का स्वरूप
देखने और निःस्वार्थ भाव से सेवा करने की प्रेरणा दें।
श्री दत्त पूजा और आरती में ध्यान रखने योग्य बातें
- पूजा स्थान और पूजन सामग्री को स्वच्छ रखें।
- आरती से पहले हाथ-पैर धोएँ या स्नान करें।
- दीपक और कपूर जलाते समय अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें।
- छोटे बच्चों को जलती हुई आरती की थाली अकेले न दें।
- भगवान को ताजा और सात्त्विक प्रसाद ही अर्पित करें।
- आरती के शब्दों का उच्चारण यथासंभव स्पष्ट रखें।
- अपनी गुरु, कुल और पारिवारिक परंपरा का सम्मान करें।
- पूजा में प्रदर्शन के स्थान पर श्रद्धा और विनम्रता को महत्त्व दें।
- मंत्र-जप के लिए साफ आसन और शांत स्थान का उपयोग करें।
- पूजा के बाद प्रसाद को सम्मानपूर्वक ग्रहण और वितरित करें।
क्या घर में श्री दत्त आरती कर सकते हैं?
हाँ, भगवान दत्तात्रेय की आरती घर के मंदिर में सरलता से की जा सकती है। इसके लिए किसी
जटिल पूजा-विधि की आवश्यकता नहीं है।
भगवान दत्तात्रेय की तस्वीर के सामने दीपक जलाएँ, पुष्प और प्रसाद अर्पित करें,
“श्री गुरुदेव दत्त” मंत्र का जाप करें और श्रद्धापूर्वक श्री दत्त आरती गाएँ।
सभी पूजन सामग्री उपलब्ध न होने पर केवल दीपक, जल और पुष्प के साथ भी आरती की जा सकती है।
धार्मिक साधना में बाहरी सामग्री से अधिक श्रद्धा, सदाचार और शुद्ध भावना को महत्त्व दिया जाता है।
श्री दत्त आरती से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दत्त आरती किस भाषा में है?
“त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा” श्री दत्त आरती मूल रूप से मराठी भाषा में
प्रचलित है। इसे हिंदी भाषी भक्त भी देवनागरी लिपि में आसानी से पढ़ सकते हैं।
श्री दत्त आरती कब करनी चाहिए?
आरती सुबह की पूजा के बाद या शाम को सूर्यास्त के समय की जा सकती है। गुरुवार,
दत्त जयंती और गुरु पूर्णिमा पर भी विशेष रूप से आरती की जाती है।
क्या श्री दत्त आरती प्रतिदिन कर सकते हैं?
हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार प्रतिदिन भगवान दत्तात्रेय की आरती कर सकते हैं।
भगवान दत्तात्रेय का सबसे सरल मंत्र कौन-सा है?
“श्री गुरुदेव दत्त” भगवान दत्तात्रेय का सरल और व्यापक रूप से प्रचलित नाम मंत्र है।
श्री दत्त आरती से पहले क्या पढ़ना चाहिए?
आरती से पहले भगवान गणेश का स्मरण, गुरु वंदना, श्री दत्त मंत्र, दत्त स्तोत्र या
दत्त चालीसा का पाठ किया जा सकता है।
भगवान दत्तात्रेय को कौन-सा प्रसाद चढ़ाया जाता है?
भगवान दत्तात्रेय को फल, मिठाई, दूध, खीर, गुड़-चना या घर में बनाया गया सात्त्विक
भोजन अर्पित किया जा सकता है।
क्या महिलाएँ श्री दत्त आरती कर सकती हैं?
हाँ, स्त्री और पुरुष दोनों श्रद्धा, स्वच्छता और भक्तिभाव से भगवान दत्तात्रेय की
पूजा और आरती कर सकते हैं।
आरती के लिए घी का दीपक आवश्यक है?
घी का दीपक सात्त्विक माना जाता है, लेकिन उसके उपलब्ध न होने पर शुद्ध तेल का दीपक
या कपूर भी उपयोग किया जा सकता है।
भगवान दत्तात्रेय को त्रिमूर्ति स्वरूप क्यों कहा जाता है?
भगवान दत्तात्रेय के स्वरूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सृजन, पालन तथा संहार
शक्तियों का समन्वय माना जाता है। इसलिए उन्हें त्रिमूर्ति स्वरूप कहा जाता है।
निष्कर्ष
श्री दत्त आरती भगवान दत्तात्रेय के त्रिमूर्ति, सर्वव्यापी और गुरु-स्वरूप
की स्तुति करने वाली भक्तिमय रचना है। आरती भक्त को अहंकार से ऊपर उठकर गुरु और परमात्मा
के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा देती है।
भक्त अपनी सुविधा के अनुसार सुबह या शाम भगवान दत्तात्रेय की पूजा करके यह आरती गा सकते हैं।
नियमित नाम-स्मरण, सदाचार, गुरु के प्रति सम्मान और निःस्वार्थ सेवा श्री दत्त उपासना के
मूल भाव माने जाते हैं।
श्रद्धापूर्वक “श्री गुरुदेव दत्त” का स्मरण करते हुए की गई आरती मन में शांति, विश्वास,
विनम्रता और आध्यात्मिक जागरूकता विकसित करने में सहायक हो सकती है।
