श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् | Shri Gopal Sahasranama Stotram in Hindi & English Lyrics PDF
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्: अर्थ, पाठ विधि और लाभ
1. Introduction – श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का परिचय
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् भगवान श्रीकृष्ण के गोपाल स्वरूप की अत्यंत पवित्र और भक्तिमय स्तुति है। “गोपाल” नाम श्रीकृष्ण के उस प्रेममय रूप को दर्शाता है, जो गोकुल-वृंदावन में गायों की रक्षा करने वाले, भक्तों के पालनहार, मुरलीधर, करुणामय और आनंदस्वरूप हैं। यह स्तोत्र केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण की लीलाओं, गुणों, सौंदर्य, करुणा, शक्ति और परम दिव्यता का भावपूर्ण स्मरण है।
हिंदू वैष्णव परंपरा में भगवान के नाम का जप बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि ईश्वर का नाम स्वयं ईश्वर की कृपा से जुड़ा होता है। इसलिए जब भक्त श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण के सहस्त्रनामों का स्मरण करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे भक्ति, शांति और सकारात्मकता से भरने लगता है।
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ उन भक्तों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है जो जीवन में मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, संतान सुख, कृष्ण भक्ति, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति को भगवान कृष्ण के प्रेममय स्वरूप से जोड़ता है और मन को सांसारिक तनाव से हटाकर भक्ति की ओर ले जाता है।
2. What is श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्?
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् भगवान श्रीकृष्ण के हजार नामों का पवित्र स्तोत्र है। “सहस्त्रनाम” का अर्थ होता है — एक हजार नाम। इस स्तोत्र में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक दिव्य नामों, स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। हर नाम श्रीकृष्ण की किसी विशेष लीला, शक्ति, कृपा, सौंदर्य, धर्म, ज्ञान या भक्तवत्सल स्वभाव को प्रकट करता है।
इस स्तोत्र में श्रीकृष्ण को गोपाल, गोविंद, माधव, मुरारी, वासुदेव, नारायण, दामोदर, मुरलीधर, भक्तवत्सल, करुणासागर और जगत के पालनकर्ता के रूप में स्मरण किया जाता है। इन नामों का पाठ भक्त को भगवान कृष्ण के अलग-अलग दिव्य रूपों से जोड़ता है।
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् केवल पूजा-पाठ का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक ध्यान साधना भी है। जब भक्त इन नामों को भाव से पढ़ता या सुनता है, तो मन में श्रीकृष्ण की छवि, उनकी मुरली, वृंदावन की लीलाएं, गोपियों की भक्ति और गोकुल की पवित्रता का अनुभव होने लगता है।
सरल भाषा में कहा जाए तो श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् भगवान कृष्ण के प्रेम, करुणा, आनंद और दिव्यता को याद करने का सुंदर माध्यम है। यह स्तोत्र भक्त के मन को शांत करता है और उसे भगवान के प्रति अधिक समर्पित बनाता है।
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् हिंदी में अनुवाद सहित
Shri Gopal Sahasranama Stotram in Hindi Lyrics
अथ ध्यानम
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौत्तिकं करतले वेणुं करे कंकणम ।
सर्वाड़्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलि –
र्गोपस्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणि: ।।1।।
फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्साड़्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम ।
गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं
गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याड़्गभूषं भजे ।।2।।
इति ध्यानम
ऊँ क्लीं देव: कामदेव: कामबीजशिरोमणि: ।
श्रीगोपालको महीपाल: सर्वव्र्दान्तपरग: ।।1।।
धरणीपालको धन्य: पुण्डरीक: सनातन: ।
गोपतिर्भूपति: शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुख: ।।2।।
आदिकर्ता महाकर्ता महाकाल: प्रतापवान ।
जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसु: ।।3।।
मत्स्यो भीम: कुहूभर्ता हर्ता वाराहमूर्तिमान ।
नारायणो ह्रषीकेशो गोविन्दो गरुडध्वज: ।।4।।
गोकुलेन्द्रो महाचन्द्र: शर्वरीप्रियकारक: ।
कमलामुखलोलाक्ष: पुण्डरीक शुभावह: ।।5।।
दुर्वासा: कपीलो भौम: सिन्धुसागरसड़्गम: ।
गोविन्दो गोपतिर्गोत्र: कालिन्दीप्रेमपूरक: ।।6।।
गोपस्वामी गोकुलेन्द्रो गोवर्धनवरप्रद: ।
नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्रयभंजन: ।।7।।
सर्वमंगलदाता च सर्वकामप्रदायक: ।
आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिन्धुज: ।।8।।
गजगामी गजोद्धारी कामी कामकलानिधि: ।
कलंकरहितश्चन्द्रो बिम्बास्यो बिम्बसत्तम: ।।9।।
मालाकार: कृपाकार: कोकिलास्वरभूषण: ।
रामो नीलाम्बरो देवो हली दुर्दममर्दन: ।।10।।
सहस्राक्षपुरीभेत्ता महामारीविनाशन: ।
शिव: शिवतमो भेत्ता बलारातिप्रपूजक: ।।11।।
कुमारीवरदायी च वरेण्यो मीनकेतन: ।
नरो नारायणो धीरो राधापतिरुदारधी: ।।12।।
श्रीपति: श्रीनिधि: श्रीमान मापति: प्रतिराजहा ।
वृन्दापति: कुलग्रामी धामी ब्रह्मसनातन: ।।13।।
रेवतीरमणो रामाश्चंचलश्चारुलोचन: ।
रामायणशरीरोsयं रामी राम: श्रिय:पति: ।।14।।
शर्वर: शर्वरी शर्व: सर्वत्रशुभदायक: ।
राधाराधायितो राधी राधाचित्तप्रमोदक: ।।15।।
राधारतिसुखोपेतो राधामोहनतत्पर: ।
राधावशीकरो राधाह्रदयांभोजषट्पद: ।।16।।
राधालिंगनसंमोहो राधानर्तनकौतुक: ।
राधासंजातसम्प्रीती राधाकामफलप्रद: ।।17।।
वृन्दापति: कोशनिधिर्लोकशोकविनाशक: ।
चन्द्रापतिश्चन्द्रपतिश्चण्डकोदण्दभंजन: ।।18।।
रामो दाशरथी रामो भृगुवंशसमुदभव: ।
आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभंजन ।।19।।
वृषभानुर्भवो भाव: काश्यपि: करुणानिधि: ।
कोलाहलो हली हाली हेली हलधरप्रिय: ।।20।।
राधामुखाब्जमार्तण्डो भास्करो विरजो विधु: ।
विधिर्विधाता वरुणो वारुणो वारुणीप्रिय: ।।21।।
रोहिणीह्रदयानन्दी वसुदेवात्मजो बलि: ।
नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोsमल: ।।22।।
नागो नवाम्भोविरुदो वीरहा वरदो बली ।
गोपथो विजयी विद्वान शिपिविष्ट: सनातन: ।।23।।
पर्शुरामवचोग्राही वरग्राही श्रृगालहा ।
दमघोषोपदेष्टा च रथग्राही सुदर्शन: ।।24।।
वीरपत्नीयशस्राता जराव्याधिविघातक: ।
द्वारकावासतत्त्वज्ञो हुताशनवरप्रद: ।।25।।
यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधर: प्रभु: ।
विभु: शरासनो धन्वी गणेशो गणनायक: ।।26।।
लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनशन: ।
वामनो वामनीभूतो बलिजिद्विक्रमत्रय: ।।27।।
यशोदानन्दन: कर्ता यमलार्जुनमुक्तिद:
उलूखली महामानी दामबद्धाह्वयी शमी ।।28।।
भक्तानुकारी भगवान केशवोsचलधारक: ।
केशिहा मधुहा मोही वृषासुरविघातक: ।।29।।
अघासुरविनाशी च पूतनामोक्षदायक: ।
कुब्जाविनोदी भगवान कंसमृत्युर्महामखी ।।30।।
अश्वमेधो वाजपेयो गोमेधो नरमेधवान ।
कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुशीतल: ।।31।।
रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबल: ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावांछितप्रद: ।।32।।
कमली कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुप: ।
कमलाव्रतधारी च कमलाभ: पुरन्दर: ।।33।।
सौभाग्याधिकचित्तोsयं महामायी महोत्कट: ।
तारकारि: सुरत्राता मारीचक्षोभकारक: ।।34।।
विश्वामित्रप्रियो दान्तो रामो राजीवलोचन: ।
लंकाधिपकुलध्वंसी विभिषणवरप्रद: ।।35।।
सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धन: ।
खरदूषणसंहारी साकेतपुरवासन: ।।36।।
चन्द्रावलीपति: कूल: केशी कंसवधोsमर: ।
माधवी मधुहा माध्वी माध्वीको माधवो मधु: ।।37।।
मुंजाटवीगाहमानो धेनुकारिर्धरात्मज: ।
वंशी वटबिहारी च गोवर्धनवनाश्रय: ।।38।।
तथा तालवनोद्देशी भाण्डीरवनशंखहा ।
तृणावर्तकथाकारी वृषभनुसुतापति: ।।39।।
राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधुव्रत: ।
गोपीरंजनदैवज्ञो लीलाकमलपूजित: ।।40।।
क्रीडाकमलसन्दोहो गोपिकाप्रीतिरंजन: ।
रंजको रंजनो रड़्गो रड़्गी रंगमहीरुह ।।41।।
काम: कामारिभक्तोsयं पुराणपुरुष: कवि: ।
नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखाम्बुज: ।।42।।
अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगीदत्तवरो मुनि: ।
ऋषभ: पर्वतो ग्रामो नदीपवनवल्लभ: ।।43।।
पद्मनाभ: सुरज्येष्ठो ब्रह्मा रुद्रोsहिभूषित: ।
गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रही ।।44।।
गणाश्रयो गणाध्यक्ष: क्रोडीकृतजगत्रय: ।
यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो धुरी ।।45।।
भ्रमर: कुन्तली कुन्तीसुतरक्षी महामखी ।
यमुनावरदाता च कश्यपस्य वरप्रद: ।।46।।
शड़्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्पर: ।
पांचजन्यकरो रामी त्रिरामी वनजो जय: ।।47।।
फाल्गुन: फाल्गुनसखो विराधवधकारक: ।
रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियंकर: ।।48।।
कल्पवृक्षो महावृक्षो दानवृक्षो महाफल: ।
अंकुशो भूसुरो भामो भामको भ्रामको हरि: ।।49।।
सरल: शाश्वत: वीरो यदुवंशी शिवात्मक: ।
प्रद्युम्नबलकर्ता च प्रहर्ता दैत्यहा प्रभु: ।।50।।
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषण: ।
तुलसीदामशोभाढयो जालन्धरविनाशन: ।।51।।
शूर: सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजित: ।
रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानल: ।।52।।
दैत्यदर्पविनाशी च गरुड़ो गरुडाग्रज: ।
गोपीनाथो महीनाथो वृन्दानाथोsवरोधक: ।।53।।
प्रपंची पंचरूपश्च लतागुल्मश्च गोपति: ।
गंगा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा ।।54।।
कावेरी नर्मदा तापी गण्दकी सरयूस्तथा ।
राजसस्तामस: सत्त्वी सर्वांगी सर्वलोचन: ।।55।।
सुधामयोsमृतमयो योगिनीवल्लभ: शिव: ।
बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठोविष्णुर्जिष्णु: शचीपति: ।।56।।
वंशी वंशधरो लोको विलोको मोहनाशन: ।
रवरावो रवो रावो बालो बालबलाहक: ।।57।।
शिवो रुद्रो नलो नीलो लांगुली लांगुलाश्रय: ।
पारद: पावनो हंसो हंसारूढ़ो जगत्पति: ।।58।।
मोहिनीमोहनो मायी महामायो महामखी ।
वृषो वृषाकपि: काल: कालीदमनकारक: ।।59।।
कुब्जभाग्यप्रदो वीरो रजकक्षयकारक: ।
कोमलो वारुणो राज जलदो जलधारक: ।।60।।
हारक: सर्वपापघ्न: परमेष्ठी पितामह: ।
खड्गधारी कृपाकारी राधारमणसुन्दर: ।।61।।
द्वादशारण्यसम्भोगी शेषनागफणालय: ।
कामश्याम: सुख: श्रीद: श्रीपति: श्रीनिधि: कृति: ।।62।।
हरिर्हरो नरो नारो नरोत्तम इषुप्रिय: ।
गोपालो चित्तहर्ता च कर्ता संसारतारक: ।।63।।
आदिदेवो महादेवो गौरीगुरुरनाश्रय: ।
साधुर्मधुर्विधुर्धाता भ्राताsक्रूरपरायण: ।।64।।
रोलम्बी च हयग्रीवो वानरारिर्वनाश्रय: ।
वनं वनी वनाध्यक्षो महाबंधो महामुनि: ।।65।।
स्यमन्तकमणिप्राज्ञो विज्ञो विघ्नविघातक: ।
गोवर्धनो वर्धनीयो वर्धनी वर्धनप्रिय: ।।66।।
वर्धन्यो वर्धनो वर्धी वार्धिन्य: सुमुखप्रिय: ।
वर्धितो वृद्धको वृद्धो वृन्दारकजनप्रिय: ।।67।।
गोपालरमणीभर्ता साम्बुकुष्ठविनाशन: ।
रुक्मिणीहरण: प्रेमप्रेमी चन्द्रावलीपति: ।।68।।
श्रीकर्ता विश्वभर्ता च नारायणनरो बली ।
गणो गणपतिश्चैव दत्तात्रेयो महामुनि: ।।69।।
व्यासो नारायणो दिव्यो भव्यो भावुकधारक: ।
श्व: श्रेयसं शिवं भद्रं भावुकं भविकं शुभम ।।70।।
शुभात्मक: शुभ: शास्ता प्रशस्ता मेघनादहा ।
ब्रह्मण्यदेवो दीनानामुद्धारकरणक्षम: ।।71।।
कृष्ण: कमलपत्राक्ष: कृष्ण: कमललोचन: ।
कृष्ण: कामी सदा कृष्ण: समस्तप्रियकारक: ।।72।।
नन्दो नन्दी महानन्दी मादी मादनक: किली ।
मिली हिली गिली गोली गोलो गोलालयी गुली ।।73।।
गुग्गुली मारकी शाखी वट: पिप्पलक: कृती ।
म्लेक्षहा कालहर्ता च यशोदायश एव च ।।74।।
अच्युत: केशवो विष्णुर्हरि: सत्यो जनार्दन: ।
हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तिपरायण: ।।75।।
जानकीवल्लभो रामो विरामो विघ्ननाशन: ।
सहस्रांशुर्महाभानुर्वीरबाहुर्महोदधि: ।।76।।
समुद्रोsब्धिरकूपार: पारावार: सरित्पति: ।
गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञापरिपालक: ।।77।।
सदाराम: कृपारामो महारामो धनुर्धर: ।
पर्वत: पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रिय: ।।78।।
कमलाश्वतरो रामो रामायणप्रवर्तक: ।
द्यौदिवौ दिवसो दिव्यो भव्यो भाविभयापह: ।।79।।
पार्वतीभाग्यसहितो भ्राता लक्ष्मीविलासवान ।
विलासी साहसी सर्वी गर्वी गर्वितलोचन: ।।80।।
मुरारिर्लोकधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तक: ।
यमो यमादिर्यमनो यामी यामविधायक: ।।81।।
वसुली पांसुली पांसुपाण्डुरर्जुनवल्लभ: ।
ललिताचन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रय: ।।82।।
अम्बुजाक्षो महायज्ञो दक्षश्चिन्तामणिप्रभु: ।
मणिर्दिनमणिश्चैव केदारो बदरीश्रय: ।।83।।
बदरीवनसम्प्रीतो व्यास: सत्यवतीसुत: ।
अमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुर्विधूदय: ।।84।।
चन्द्रो रवि: शिव: शूली चक्री चैव गदाधर: ।
श्रीकर्ता श्रीपति: श्रीद: श्रीदेवो देवकीसुत: ।।85।।
श्रीपति: पुण्डरीकाक्ष: पद्मनाभो जगत्पति: ।
वासुदेवोsप्रमेयात्मा केशवो गरुडध्वज: ।।86।।
नारायण: परं धाम देवदेवो महेश्वर: ।
चक्रपाणि: कलापूर्णो वेदवेद्यो दयानिधि: ।।87।।
भगवान सर्वभूतेशो गोपाल: सर्वपालक: ।
अनन्तो निर्गुणोsनन्तो निर्विकल्पो निरंजन: ।।88।।
निराधारो निराकारो निराभासो निराश्रय: ।
पुरुष: प्रणवातीतो मुकुन्द: परमेश्वर: ।।89।।
क्षणावनि: सर्वभौमो वैकुण्ठो भक्तवत्सल: ।
विष्णुर्दामोदर: कृष्णो माधवो मथुरापति: ।।90।।
देवकीगर्भसम्भूतयशोदावत्सलो हरि: ।
शिव: संकर्षण: शंभुर्भूतनाथो दिवस्पति: ।।91।।
अव्यय: सर्वधर्मज्ञो निर्मलो निरुपद्रव: ।
निर्वाणनायको नित्योsनिलजीमूतसन्निभ: ।।92।।
कालाक्षयश्च सर्वज्ञ: कमलारूपतत्पर: ।
ह्रषीकेश: पीतवासा वासुदेवप्रियात्मज: ।।93।।
नन्दगोपकुमारार्यो नवनीताशन: प्रभु: ।
पुराणपुरुष: श्रेष् शड़्खपाणि: सुविक्रम: ।।94।।
अनिरुद्धश्वक्ररथ: शार्ड़्गपाणिश्चतुर्भुज: ।
गदाधर: सुरार्तिघ्नो गोविन्दो नन्दकायुध: ।।95।।
वृन्दावनचर: सौरिर्वेणुवाद्यविशारद: ।
तृणावर्तान्तको भीमसाहसो बहुविक्रम: ।।96।।
सकटासुरसंहारी बकासुरविनाशन: ।
धेनुकासुरसड़्घात: पूतनारिर्नृकेसरी ।।97।।
पितामहो गुरु: साक्षी प्रत्यगात्मा सदाशिव: ।
अप्रमेय: प्रभु: प्राज्ञोsप्रतर्क्य: स्वप्नवर्धन: ।।98।।
धन्यो मान्यो भवो भावो धीर: शान्तो जगदगुरु: ।
अन्तर्यामीश्वरो दिव्यो दैवज्ञो देवता गुरु: ।।99।।
क्षीराब्धिशयनो धाता लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रज: ।
धात्रीपतिरमेयात्मा चन्द्रशेखरपूजित: ।।100।।
लोकसाक्षी जगच्चक्षु: पुण्य़चारित्रकीर्तन: ।
कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रह: ।।101।।
मन्दस्मिततमो गोपो गोपिका परिवेष्टित: ।
फुल्लारविन्दनयनश्चाणूरान्ध्रनिषूदन: ।।102।।
इन्दीवरदलश्यामो बर्हिबर्हावतंसक: ।
मुरलीनिनदाह्लादो दिव्यमाल्यो वराश्रय: ।।103।।
सुकपोलयुग: सुभ्रूयुगल: सुललाटक: ।
कम्बुग्रीवो विशालाक्षो लक्ष्मीवान शुभलक्षण: ।।104।।
पीनवक्षाश्चतुर्बाहुश्चतुर्मूर्तीस्त्रिविक्रम: ।
कलंकरहित: शुद्धो दुष्टशत्रुनिबर्हण: ।।105।।
किरीटकुण्डलधर: कटकाड़्गदमण्डित: ।
मुद्रिकाभरणोपेत: कटिसूत्रविराजित: ।।106।।
मंजीररंजितपद: सर्वाभरणभूषित: ।
विन्यस्तपादयुगलो दिव्यमंगलविग्रह: ।।107।।
गोपिकानयनानन्द: पूर्णश्चन्द्रनिभानन: ।
समस्तजगदानन्दसुन्दरो लोकनन्दन: ।।108।।
यमुनातीरसंचारी राधामन्मथवैभव: ।
गोपनारीप्रियो दान्तो गोपिवस्त्रापहारक: ।।109।।
श्रृंगारमूर्ति: श्रीधामा तारको मूलकारणम ।
सृष्टिसंरक्षणोपाय: क्रूरासुरविभंजन ।।110।।
नरकासुरहारी च मुरारिर्वैरिमर्दन: ।
आदितेयप्रियो दैत्यभीकरश्चेन्दुशेखर: ।।111।।
जरासन्धकुलध्वंसी कंसाराति: सुविक्रम: ।
पुण्यश्लोक: कीर्तनीयो यादवेन्द्रो जगन्नुत: ।।112।।
रुक्मिणीरमण: सत्यभामाजाम्बवतीप्रिय: ।
मित्रविन्दानाग्नजितीलक्ष्मणासमुपासित: ।।113।।
सुधाकरकुले जातोsनन्तप्रबलविक्रम: ।
सर्वसौभाग्यसम्पन्नो द्वारकायामुपस्थित: ।।114।।
भद्रसूर्यसुतानाथो लीलामानुषविग्रह: ।
सहस्रषोडशस्त्रीशो भोगमोक्षैकदायक: ।।115।।
वेदान्तवेद्य: संवेद्यो वैधब्रह्माण्डनयक: ।
गोवर्धनधरो नाथ: सर्वजीवदयापर: ।।116।।
मूर्तिमान सर्वभूतात्मा आर्तत्राणपरायण: ।
सर्वज्ञ: सर्वसुलभ: सर्वशास्त्रविशारद: ।।117।।
षडगुणैश्चर्यसम्पन्न: पूर्णकामो धुरन्धर: ।
महानुभाव: कैवल्यदायको लोकनायक: ।।118।।
आदिमध्यान्तरहित: शुद्धसात्त्विकविग्रह: ।
आसमानसमस्तात्मा शरणागतवत्सल: ।।119।।
उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं सर्वकारणम ।
गंभीर: सर्वभावज्ञ: सच्चिदानन्दविग्रह: ।।120।।
विष्वक्सेन: सत्यसन्ध: सत्यवान्सत्यविक्रम: ।
सत्यव्रत: सत्यसंज्ञ सर्वधर्मपरायण: ।।121।।
आपन्नार्तिप्रशमनो द्रौपदीमानरक्षक: ।
कन्दर्पजनक: प्राज्ञो जगन्नाटकवैभव: ।।122।।
भक्तिवश्यो गुणातीत: सर्वैश्वर्यप्रदायक: ।
दमघोषसुतद्वेषी बाण्बाहुविखण्डन: ।।123।।
भीष्मभक्तिप्रदो दिव्य: कौरवान्वयनाशन: ।
कौन्तेयप्रियबन्धुश्च पार्थस्यन्दनसारथि: ।।124।।
नारसिंहो महावीरस्तम्भजातो महाबल: ।
प्रह्लादवरद: सत्यो देवपूज्यो भयंकर: ।।125।।
उपेन्द्र: इन्द्रावरजो वामनो बलिबन्धन: ।
गजेन्द्रवरद: स्वामी सर्वदेवनमस्कृत: ।।126।।
शेषपर्यड़्कशयनो वैनतेयरथो जयी ।
अव्याहतबलैश्वर्यसम्पन्न: पूर्णमानस: ।।127।।
योगेश्वरेश्वर: साक्षी क्षेत्रज्ञो ज्ञानदायक: ।
योगिह्रत्पड़्कजावासो योगमायासमन्वित: ।।128।।
नादबिन्दुकलातीतश्चतुर्वर्गफलप्रद: ।
सुषुम्नामार्गसंचारी सन्देहस्यान्तरस्थित: ।।129।।
देहेन्द्रियमन: प्राणसाक्षी चेत:प्रसादक: ।
सूक्ष्म: सर्वगतो देहीज्ञानदर्पणगोचर: ।।130।।
तत्त्वत्रयात्मकोsव्यक्त: कुण्डलीसमुपाश्रित: ।
ब्रह्मण्य: सर्वधर्मज्ञ: शान्तो दान्तो गतक्लम: ।।131।।
श्रीनिवास: सदानन्दी विश्वमूर्तिर्महाप्रभु: ।
सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात: ।।132।।
समस्तभुवनाधार: समस्तप्राणरक्षक: ।
समस्तसर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणरक्षक: ।।133।।
नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमंगल: ।
व्यूहार्चितो जगन्नाथ: श्रीवैकुण्ठपुराधिप: ।।134।।
पूर्णानन्दघनीभूतो गोपवेषधरो हरि: ।
कलापकुसुमश्याम: कोमल: शान्तविग्रह: ।।135।।
गोपाड़्गनावृतोsनन्तो वृन्दावनसमाश्रय: ।
वेणुवादरत: श्रेष्ठो देवानां हितकारक: ।।136।।
बालक्रीडासमासक्तो नवनीतस्यं तस्कर: ।
गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणि: ।।137।।
परंज्योति: पराकाश: परावास: परिस्फुट: ।
अष्टादशाक्षरो मन्त्रो व्यापको लोकपावन: ।।138।।
सप्तकोटिमहामन्त्रशेखरो देवशेखर: ।
विज्ञानज्ञानसन्धानस्तेजोराशिर्जगत्पति: ।।139।।
भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमन्दारविग्रह: ।
भक्तदारिद्रयदमनो भक्तानां प्रीतिदायक: ।।140।।
भक्ताधीनमना: पूज्यो भक्तलोकशिवंकर: ।
भक्ताभीष्टप्रद: सर्वभक्ताघौघनिकृन्तन: ।।141।।
अपारकरुणासिन्धुर्भगवान भक्ततत्पर: ।।142।।
इति श्रीराधिकानाथसहस्त्रं नाम कीर्तितम ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम ।।143।।
वैष्णवानां प्रियकरं महारोगनिवारणम ।
ब्रह्महत्यासुरापानं परस्त्रीगमनं तथा ।।144।।
परद्रव्यापहरणं परद्वेषसमन्वितम ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम ।।145।।
सहस्त्रनामपठनात्सर्व नश्यति तत्क्षणात ।
महादारिद्र्ययुक्तो यो वैष्णवो विष्णुभक्तिमान ।।146।।
कार्तिक्यां सम्पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तर क्रमात ।
पीताम्बरधरो धीमासुगन्धिपुष्पचन्दनै: ।।147।।
पुस्तकं पूजयित्वा तु नैवेद्यादिभिरेव च ।
राधाध्यानाड़िकतो धीरो वनमालाविभूषित: ।।148।।
शतमष्टोत्तरं देवि पठेन्नामसहस्त्रकम ।
चैत्रशुक्ले च कृष्णे च कुहूसंक्रान्तिवासरे ।।149।।
पठितव्यं प्रयत्नेन त्रौलोक्यं मोहयेत्क्षणात ।
तुलसीमालया युक्तो वैष्णवो भक्तित्पर: ।।150।।
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणं पूजयित्वा च भोजयित्वा विधानत: ।।151।।
पठेन्नामसहस्त्रं च तत: सिद्धि: प्रजायते ।
महानिशायां सततं वैष्णवो य: पठेत्सदा ।।152।।
देशान्तरगता लक्ष्मी: समायातिं न संशय: ।
त्रैलोक्ये च महादेवि सुन्दर्य: काममोहिता: ।।153।।
मुग्धा: स्वयं समायान्ति वैष्णवं च भजन्ति ता: ।
रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात ।।154।।
गुर्विणी जनयेत्पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वश्यतां यान्ति किं पुन: क्षुद्रमानवा: ।।155।।
सहस्त्रनामश्रवणात्पठनात्पूजनात्प्रिये ।
धारणात्सर्वमाप्नोति वैष्णवो नात्र संशय: ।।156।।
वंशीतटे चान्यवटे तथा पिप्पलकेsथवा ।
कदम्बपादपतले गोपालमूर्तिसन्निधौ ।।157।।
य: पठेद्वैष्णवो नित्यं स याति हरिमन्दिरम ।
कृष्णेनोक्तं राधिकायै मया प्रोक्तं पुरा शिवे ।।158।।
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया त्वयि वरारोहे प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ।।159।।
गोपनीयं प्रयत्नेन् न प्रकाश्यं कथंचन ।
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषत: ।।160।।
न दातव्यं न दातव्यं न दात्व्यं कदाचन ।
देयं शिष्याय शान्ताय विष्णुभक्तिरताय च ।।161।।
गोदानब्रह्मयज्ञादेर्वाजपेयशस्य च ।
अश्वमेधसहस्त्रस्य फलं पाठे भवेदध्रुवम् ।।162।।
मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चाटनादिकम ।
यद्यद्वांछति चित्तेन तत्तत्प्राप्नोति वैष्णव: ।।163।।
एकादश्यां नर: स्नात्वा सुगन्धिद्रव्यतैलकै: ।
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ।।164।।
तत आरम्भकर्ताsसौ सर्व प्राप्नोति मानव: ।
शतावृत्तं सहस्त्रं च य: पठेद्वैष्णवो जन: ।।165।।
श्रीवृंदावनचन्द्रस्य प्रासादात्सर्वमाप्नुयात ।
यदगृहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति ।।166।।
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गभयं क्वचित ।
सर्पादि भूतयक्षाद्या नश्यन्ति नात्र संशय: ।।167।।
श्रीगोपालो महादेवि वसेत्तस्य गृहे सदा ।
गृहे यत्र सहस्त्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ।।168।।
3. श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का अर्थ
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का मूल भाव यह है कि भगवान श्रीकृष्ण अनंत गुणों से युक्त हैं और उनके हर नाम में एक अलग आध्यात्मिक शक्ति छिपी हुई है। इस स्तोत्र में बताए गए नाम केवल संबोधन नहीं हैं, बल्कि वे श्रीकृष्ण के चरित्र, लीला और परम तत्व को समझने का मार्ग हैं।
“गोपाल” का अर्थ है गायों, पृथ्वी, इंद्रियों और भक्तों का पालन करने वाले। यह नाम श्रीकृष्ण के रक्षक और पालनकर्ता स्वरूप को प्रकट करता है। “गोविंद” नाम आनंद देने वाले और इंद्रियों को सही दिशा देने वाले भगवान को दर्शाता है। “माधव” नाम लक्ष्मीपति, मधुरता और दिव्य सौंदर्य से जुड़े कृष्ण स्वरूप का संकेत देता है। “दामोदर” नाम बाल कृष्ण की उस लीला से जुड़ा है, जिसमें माता यशोदा ने उन्हें प्रेम से बांधा था।
इस प्रकार श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का अर्थ है — भगवान कृष्ण के हजार दिव्य नामों द्वारा उनकी महिमा, प्रेम, शक्ति, करुणा और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य का स्मरण करना।
इस स्तोत्र का आध्यात्मिक संदेश यह है कि जब मनुष्य भगवान के नाम में मन लगाता है, तो उसका चित्त शुद्ध होता है, अहंकार कम होता है, चिंता घटती है और जीवन में भक्ति का भाव बढ़ता है। श्रीकृष्ण के नाम भक्त को यह सिखाते हैं कि जीवन केवल संघर्ष नहीं है, बल्कि प्रेम, धर्म, सेवा, आनंद और समर्पण का सुंदर मार्ग भी है।
4. श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् कब और कैसे करें?
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ किसी भी दिन श्रद्धा और शुद्ध भाव से किया जा सकता है। फिर भी गुरुवार, बुधवार, एकादशी, पूर्णिमा, जन्माष्टमी, गीता जयंती और भगवान कृष्ण से जुड़े विशेष पर्वों पर इसका पाठ अधिक शुभ माना जाता है। यदि कोई भक्त नियमित पाठ करना चाहता है, तो सुबह ब्रह्म मुहूर्त या स्नान के बाद का समय श्रेष्ठ माना जा सकता है।
पाठ करने से पहले घर के पूजा स्थान को साफ करें। भगवान श्रीकृष्ण, बाल गोपाल या राधा-कृष्ण की मूर्ति या चित्र के सामने आसन लगाकर बैठें। दीपक जलाएं, तुलसी पत्र, पीले या सफेद फूल, मिश्री, माखन, दूध या सात्त्विक भोग अर्पित करें। तुलसी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय मानी जाती है, इसलिए पूजा में तुलसी पत्र का विशेष महत्व है।
पाठ शुरू करने से पहले मन को शांत करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” मंत्र का कुछ बार जप करें। इसके बाद श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करें। यदि पूरा सहस्त्रनाम एक बार में पढ़ना कठिन लगे, तो भक्त इसे भागों में भी पढ़ सकता है या प्रतिदिन कुछ नामों का भावपूर्वक स्मरण कर सकता है।
पाठ के समय केवल शब्दों को जल्दी-जल्दी पढ़ना पर्याप्त नहीं है। हर नाम को श्रद्धा, प्रेम और ध्यान के साथ पढ़ना चाहिए। यदि संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो, तो धीरे-धीरे अभ्यास करें या पहले हिंदी अर्थ पढ़कर भाव समझें। भगवान नाम में भावना सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वास्तु और पूजा दृष्टि से पाठ करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना अच्छा माना जाता है। पूजा स्थान स्वच्छ, शांत और सुगंधित हो तो मन अधिक एकाग्र रहता है। पाठ के बाद भगवान कृष्ण से परिवार की शांति, सद्बुद्धि, भक्ति, प्रेम, संतान सुख, धर्ममय जीवन और मन की स्थिरता की प्रार्थना करें।
5. श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के लाभ
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का नियमित पाठ भक्त के भीतर श्रीकृष्ण भक्ति, मानसिक शांति और आध्यात्मिक स्थिरता को बढ़ाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान के सहस्त्रनाम का स्मरण मन को पवित्र करता है और व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, भय, क्रोध, भ्रम और चिंता से दूर ले जाता है। जब भक्त बार-बार श्रीकृष्ण के नामों का उच्चारण करता है, तो उसका मन सांसारिक तनाव से हटकर प्रेम, विश्वास और भक्ति की ओर बढ़ता है।
इस स्तोत्र के पाठ से पारिवारिक वातावरण में शांति, संबंधों में मधुरता और मन में करुणा का भाव बढ़ने की मान्यता है। भगवान कृष्ण का गोपाल स्वरूप पालन, सुरक्षा, प्रेम और आनंद का प्रतीक है, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ घर में सकारात्मक ऊर्जा और भक्तिमय वातावरण बनाने में सहायक माना जाता है।
संतान सुख, बालकों की रक्षा, परिवार की उन्नति और गृहस्थ जीवन में संतुलन के लिए भी श्रीकृष्ण की गोपाल रूप में पूजा विशेष शुभ मानी जाती है। जिन लोगों के मन में चिंता, अस्थिरता, अकेलापन या भावनात्मक तनाव अधिक रहता है, वे श्री गोपाल सहस्त्रनाम के पाठ से आंतरिक सहारा और शांति का अनुभव कर सकते हैं।
आध्यात्मिक रूप से यह स्तोत्र भक्त को नाम-स्मरण की शक्ति से जोड़ता है। श्रीकृष्ण के हजार नामों का चिंतन भक्त को यह अनुभव कराता है कि भगवान केवल मंदिर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर कर्म, विचार और भावना में उपस्थित हो सकते हैं।
व्यावहारिक दृष्टि से भी यह पाठ व्यक्ति को धैर्य, सद्बुद्धि, प्रेमपूर्ण व्यवहार और सकारात्मक जीवन दृष्टि देता है। जब मन शांत होता है, तो व्यक्ति परिवार, काम और समाज में बेहतर निर्णय ले पाता है। इसलिए श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् को केवल फल प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि मन, व्यवहार और भक्ति को सुंदर बनाने वाली आध्यात्मिक साधना माना जा सकता है।
Shri Gopal Sahasranama Stotram in English Lyrics
dhyānam |
phullēndīvarakāntiminduvadanaṁ barhāvataṁsapriyaṁ
śrīvatsāṅkamudārakaustubhadharaṁ pītāmbaraṁ sundaram |
gōpīnāṁ nayanōtpalārcitatanuṁ gōgōpasaṅghāvr̥taṁ
gōvindaṁ kalavēṇuvādanaparaṁ divyāṅgabhūṣaṁ bhajē || 1 ||
kastūrītilakaṁ lalāṭaphalakē vakṣassthalē kaustubhaṁ
nāsāgrē varamauktikaṁ karatalē vēṇuṁ karē kaṅkaṇam |
sarvāṅgē haricandanaṁ ca kalayan kaṇṭhē ca muktāvaliṁ
gōpastrīparivēṣṭitō vijayatē gōpālacūḍāmaṇiḥ || 2 ||
ōṁ klīṁ dēvaḥ kāmadēvaḥ kāmabījaśirōmaṇiḥ |
śrīgōpālō mahīpālō vēdavēdāṅgapāragaḥ || 1 ||
kr̥ṣṇaḥ kamalapatrākṣaḥ puṇḍarīkaḥ sanātanaḥ |
gōpatirbhūpatiḥ śāstā prahartā viśvatōmukhaḥ || 2 ||
ādikartā mahākartā mahākālaḥ pratāpavān |
jagajjīvō jagaddhātā jagadbhartā jagadvasuḥ || 3 ||
matsyō bhīmaḥ kuhūbhartā hartā vārāhamūrtimān |
nārāyaṇō hr̥ṣīkēśō gōvindō garuḍadhvajaḥ || 4 ||
gōkulēśō mahācandraḥ śarvarīpriyakārakaḥ |
kamalāmukhalōlākṣaḥ puṇḍarīkaḥ śubhāvahaḥ || 5 ||
durvāsāḥ kapilō bhaumaḥ sindhusāgarasaṅgamaḥ |
gōvindō gōpatirgōtraḥ kālindīprēmapūrakaḥ || 6 ||
gōpasvāmī gōkulēndraḥ gōvardhanavarapradaḥ |
nandādigōkulatrātā dātā dāridryabhañjanaḥ || 7 ||
sarvamaṅgaladātā ca sarvakāmavarapradaḥ |
ādikartā mahībhartā sarvasāgarasindhujaḥ || 8 ||
gajagāmī gajōddhārī kāmī kāmakalānidhiḥ |
kalaṅkarahitaścandrō bimbāsyō bimbasattamaḥ || 9 ||
mālākāraḥ kr̥pākāraḥ kōkilasvarabhūṣaṇaḥ |
rāmō nīlāmbarō dēhī halī dvividamardanaḥ || 10 ||
sahasrākṣapurībhēttā mahāmārīvināśanaḥ |
śivaḥ śivatamō bhēttā balārātiprapūjakaḥ || 11 ||
kumārīvaradāyī ca varēṇyō mīnakētanaḥ |
narō nārāyaṇō dhīrō dharāpatirudāradhīḥ || 12 ||
śrīpatiḥ śrīnidhiḥ śrīmān māpatiḥ pratirājahā |
br̥ndāpatiḥ kulaṁ grāmī dhāma brahmasanātanaḥ || 13 ||
rēvatīramaṇō rāmaḥ priyaścañcalalōcanaḥ |
rāmāyaṇaśarīraśca rāmō rāmaḥ śriyaḥpatiḥ || 14 ||
śarvaraḥ śarvarī śarvaḥ sarvatra śubhadāyakaḥ |
rādhārādhayitārādhī rādhācittapramōdakaḥ || 15 ||
rādhāratisukhōpētō rādhāmōhanatatparaḥ |
rādhāvaśīkarō rādhāhr̥dayāmbhōjaṣaṭpadaḥ || 16 ||
rādhāliṅganasammōdō rādhānartanakautukaḥ |
rādhāsañjātasamprītō rādhākāmaphalapradaḥ || 17 ||
br̥ndāpatiḥ kōkanidhiḥ kōkaśōkavināśanaḥ |
candrāpatiścandrapatiścaṇḍakōdaṇḍabhañjanaḥ || 18 ||
rāmō dāśarathī rāmō bhr̥guvaṁśasamudbhavaḥ |
ātmārāmō jitakrōdhō mōhō mōhāndhabhañjanaḥ || 19 ||
vr̥ṣabhānubhavō bhāvī kāśyapiḥ karuṇānidhiḥ |
kōlāhalō halō hālī halī haladharapriyaḥ || 20 ||
rādhāmukhābjamārtāṇḍō bhāskarō ravijō vidhuḥ |
vidhirvidhātā varuṇō vāruṇō vāruṇīpriyaḥ || 21 ||
rōhiṇīhr̥dayānandī vasudēvātmajō baliḥ |
nīlāmbarō rauhiṇēyō jarāsandhavadhō:’malaḥ || 22 ||
nāgō javāmbhō virudō vīrahā varadō balī |
gōpadō vijayī vidvān śipiviṣṭaḥ sanātanaḥ || 23 ||
paraśurāmavacōgrāhī varagrāhī sr̥gālahā |
damaghōṣōpadēṣṭā ca rathagrāhī sudarśanaḥ || 24 ||
vīrapatnīyaśastrātā jarāvyādhivighātakaḥ |
dvārakāvāsatattvajñō hutāśanavarapradaḥ || 25 ||
yamunāvēgasaṁhārī nīlāmbaradharaḥ prabhuḥ |
vibhuḥ śarāsanō dhanvī gaṇēśō gaṇanāyakaḥ || 26 ||
lakṣmaṇō lakṣaṇō lakṣyō rakṣōvaṁśavināśakaḥ |
vāmanō vāmanībhūtō vamanō vamanāruhaḥ || 27 ||
yaśōdānandanaḥ kartā yamalārjunamuktidaḥ |
ulūkhalī mahāmānō dāmabaddhāhvayī śamī || 28 ||
bhaktānukārī bhagavān kēśavō:’caladhārakaḥ |
kēśihā madhuhā mōhī vr̥ṣāsuravighātakaḥ || 29 ||
aghāsuravighātī ca pūtanāmōkṣadāyakaḥ |
kubjāvinōdī bhagavān kaṁsamr̥tyurmahāmukhī || 30 ||
aśvamēdhō vājapēyō gōmēdhō naramēdhavān |
kandarpakōṭilāvaṇyaścandrakōṭisuśītalaḥ || 31 ||
ravikōṭipratīkāśō vāyukōṭimahābalaḥ |
brahmā brahmāṇḍakartā ca kamalāvāñchitapradaḥ || 32 ||
kamalī kamalākṣaśca kamalāmukhalōlupaḥ |
kamalāvratadhārī ca kamalābhaḥ purandaraḥ || 33 ||
saubhāgyādhikacittaśca mahāmāyī madōtkaṭaḥ |
tāṭakāriḥ suratrātā mārīcakṣōbhakārakaḥ || 34 ||
viśvāmitrapriyō dāntō rāmō rājīvalōcanaḥ |
laṅkādhipakuladhvaṁsī vibhīṣaṇavarapradaḥ || 35 ||
sītānandakarō rāmō vīrō vāridhibandhanaḥ |
kharadūṣaṇasaṁhārī sākētapuravāsavān || 36 ||
candrāvalipatiḥ kūlaḥ kēśikaṁsavadhō:’maraḥ |
mādhavō madhuhā mādhvī mādhvīkō mādhavī vibhuḥ || 37 ||
muñjāṭavīgāhamānō dhēnukārirdaśātmajaḥ |
vaṁśīvaṭavihārī ca gōvardhanavanāśrayaḥ || 38 ||
tathā tālavanōddēśī bhāṇḍīravanaśaṅkaraḥ |
tr̥ṇāvartakr̥pākārī vr̥ṣabhānusutāpatiḥ || 39 ||
rādhāprāṇasamō rādhāvadanābjamadhūtkaṭaḥ |
gōpīrañjanadaivajñaḥ līlākamalapūjitaḥ || 40 ||
krīḍākamalasandōhō gōpikāprītirañjanaḥ |
rañjakō rañjanō raṅgō raṅgī raṅgamahīruhaḥ || 41 ||
kāmaḥ kāmāribhaktaśca purāṇapuruṣaḥ kaviḥ |
nāradō dēvalō bhīmō bālō bālamukhāmbujaḥ || 42 ||
ambujō brahmasākṣī ca yōgī dattavarō muniḥ |
r̥ṣabhaḥ parvatō grāmō nadīpavanavallabhaḥ || 43 ||
padmanābhaḥ surajyēṣṭhō brahmā rudrō:’hibhūṣitaḥ |
gaṇānāṁ trāṇakartā ca gaṇēśō grahilō grahiḥ || 44 ||
gaṇāśrayō gaṇādhyakṣō krōḍīkr̥tajagattrayaḥ |
yādavēndrō dvārakēndrō mathurāvallabhō dhurī || 45 ||
bhramaraḥ kuntalī kuntīsutarakṣī mahāmanāḥ |
yamunāvaradātā ca kāśyapasya varapradaḥ || 46 ||
śaṅkhacūḍavadhōddāmō gōpīrakṣaṇatatparaḥ |
pāñcajanyakarō rāmī trirāmī vanajō jayaḥ || 47 ||
phālguṇaḥ phalgunasakhō virādhavadhakārakaḥ |
rukmiṇīprāṇanāthaśca satyabhāmāpriyaṅkaraḥ || 48 ||
kalpavr̥kṣō mahāvr̥kṣō dānavr̥kṣō mahāphalaḥ |
aṅkuśō bhūsurō bhāvō bhāmakō bhrāmakō hariḥ || 49 ||
saralaḥ śāśvatō vīrō yaduvaṁśaśivātmakaḥ |
pradyumnō balakartā ca prahartā daityahā prabhuḥ || 50 ||
mahādhanō mahāvīrō vanamālāvibhūṣaṇaḥ |
tulasīdāmaśōbhāḍhyō jālandharavināśanaḥ || 51 ||
sūraḥ sūryō mr̥kaṇḍuśca bhāsvarō viśvapūjitaḥ |
ravistamōhā vahniśca bāḍabō baḍabānalaḥ || 52 ||
daityadarpavināśī ca garuḍō garuḍāgrajaḥ |
gōpīnāthō mahīnāthō br̥ndānāthō:’varōdhakaḥ || 53 ||
prapañcī pañcarūpaśca latāgulmaśca gōmatiḥ |
gaṅgā ca yamunārūpō gōdā vētravatī tathā || 54 ||
kāvērī narmadā tāpī gaṇḍakī sarayū rajaḥ |
rājasastāmasassattvī sarvāṅgī sarvalōcanaḥ || 55 ||
sudhāmayō:’mr̥tamayō yōgināṁ vallabhaḥ śivaḥ |
buddhō buddhimatāṁ śrēṣṭhō viṣṇurjiṣṇuḥ śacīpatiḥ || 56 ||
vaṁśī vaṁśadharō lōkō vilōkō mōhanāśanaḥ |
ravarāvō ravō rāvō valō vālō valāhakaḥ || 57 ||
śivō rudrō nalō nīlō lāṅgalī lāṅgalāśrayaḥ |
pāradaḥ pāvanō haṁsō haṁsārūḍhō jagatpatiḥ || 58 ||
mōhinīmōhanō māyī mahāmāyō mahāsukhī |
vr̥ṣō vr̥ṣākapiḥ kālaḥ kālīdamanakārakaḥ || 59 ||
kubjābhāgyapradō vīrō rajakakṣayakārakaḥ |
kōmalō vāruṇī rājā jalajō jaladhārakaḥ || 60 ||
hārakaḥ sarvapāpaghnaḥ paramēṣṭhī pitāmahaḥ |
khaḍgadhārī kr̥pākārī rādhāramaṇasundaraḥ || 61 ||
dvādaśāraṇyasambhōgī śēṣanāgaphaṇālayaḥ |
kāmaḥ śyāmaḥ sukhaśrīdaḥ śrīpatiḥ śrīnidhiḥ kr̥tiḥ || 62 ||
harirharō narō nārō narōttama iṣupriyaḥ |
gōpālacittahartā ca kartā saṁsāratārakaḥ || 63 ||
ādidēvō mahādēvō gaurīgururanāśrayaḥ |
sādhurmadhurvidhurdhātā trātā:’krūraparāyaṇaḥ || 64 ||
rōlambī ca hayagrīvō vānarārirvanāśrayaḥ |
vanaṁ vanī vanādhyakṣō mahāvandyō mahāmuniḥ || 65 ||
syamantakamaṇiprājñaḥ vijñō vighnavighātakaḥ |
gōvardhanō vardhanīyō vardhanī vardhanapriyaḥ || 66 ||
vārdhanyō vardhanō vardhī vardhiṣṇastu sukhapriyaḥ |
vardhitō vardhakō vr̥ddhō br̥ndārakajanapriyaḥ || 67 ||
gōpālaramaṇībhartā sāmbakuṣṭhavināśanaḥ |
rukmiṇīharaṇaprēmā prēmī candrāvalīpatiḥ || 68 ||
śrīkartā viśvabhartā ca nārāyaṇa narō balī |
gaṇō gaṇapatiścaiva dattātrēyō mahāmuniḥ || 69 ||
vyāsō nārāyaṇō divyō bhavyō bhāvukadhārakaḥ |
śvaḥśrēyasaṁ śivaṁ bhadraṁ bhāvukaṁ bhavukaṁ śubham || 70 ||
śubhātmakaḥ śubhaḥ śāstā praśastō mēghanādahā |
brahmaṇyadēvō dīnānāmuddhārakaraṇakṣamaḥ || 71 ||
kr̥ṣṇaḥ kamalapatrākṣaḥ kr̥ṣṇaḥ kamalalōcanaḥ |
kr̥ṣṇaḥ kāmī sadā kr̥ṣṇaḥ samastapriyakārakaḥ || 72 ||
nandō nandī mahānandī mādī mādanakaḥ kilī |
mīlī hilī gilī gōlī gōlō gōlālayō gulī || 73 ||
guggulī mārakī śākhī vaṭaḥ pippalakaḥ kr̥tī |
mlēcchahā kālahartā ca yaśōdā yaśa ēva ca || 74 ||
acyutaḥ kēśavō viṣṇuḥ hariḥ satyō janārdanaḥ |
haṁsō nārāyaṇō nīlō līnō bhaktiparāyaṇaḥ || 75 ||
jānakīvallabhō rāmō virāmō viṣanāśanaḥ |
siṁhabhānurmahābhānu-rvīrabhānurmahōdadhiḥ || 76 ||
samudrō:’bdhirakūpāraḥ pārāvāraḥ saritpatiḥ |
gōkulānandakārī ca pratijñāparipālakaḥ || 77 ||
sadārāmaḥ kr̥pārāmō mahārāmō dhanurdharaḥ |
parvataḥ parvatākārō gayō gēyō dvijapriyaḥ || 78 ||
kamalāśvatarō rāmō rāmāyaṇapravartakaḥ |
dyaurdivō divasō divyō bhavyō bhāgī bhayāpahaḥ || 79 ||
pārvatībhāgyasahitō bhartā lakṣmīsahāyavān | [vilāsavān]
vilāsī sāhasī sarvī garvī garvitalōcanaḥ || 80 ||
surārirlōkadharmajñō jīvanō jīvanāntakaḥ |
yamō yamāriryamanō yamī yāmavighātakaḥ || 81 ||
vaṁśulī pāṁśulī pāṁsuḥ pāṇḍurarjunavallabhaḥ |
lalitā candrikāmālā mālī mālāmbujāśrayaḥ || 82 ||
ambujākṣō mahāyakṣō dakṣaścintāmaṇiprabhuḥ |
maṇirdinamaṇiścaiva kēdārō badarīśrayaḥ || 83 ||
badarīvanasamprītō vyāsaḥ satyavatīsutaḥ |
amarārinihantā ca sudhāsindhuvidhūdayaḥ || 84 ||
candrō raviḥ śivaḥ śūlī cakrī caiva gadādharaḥ |
śrīkartā śrīpatiḥ śrīdaḥ śrīdēvō dēvakīsutaḥ || 85 ||
śrīpatiḥ puṇḍarīkākṣaḥ padmanābhō jagatpatiḥ |
vāsudēvō:’pramēyātmā kēśavō garuḍadhvajaḥ || 86 ||
nārāyaṇaḥ paraṁ dhāma dēvadēvō mahēśvaraḥ |
cakrapāṇiḥ kalāpūrṇō vēdavēdyō dayānidhiḥ || 87 ||
bhagavān sarvabhūtēśō gōpālaḥ sarvapālakaḥ |
anantō nirguṇō nityō nirvikalpō nirañjanaḥ || 88 ||
nirādhārō nirākārō nirābhāsō nirāśrayaḥ |
puruṣaḥ praṇavātītō mukundaḥ paramēśvaraḥ || 89 ||
kṣaṇāvaniḥ sārvabhaumō vaikuṇṭhō bhaktavatsalaḥ |
viṣṇurdāmōdaraḥ kr̥ṣṇō mādhavō mathurāpatiḥ || 90 ||
dēvakīgarbhasambhūtō yaśōdāvatsalō hariḥ |
śivaḥ saṅkarṣaṇaḥ śambhurbhūtanāthō divaspatiḥ || 91 ||
avyayaḥ sarvadharmajñō nirmalō nirupadravaḥ |
nirvāṇanāyakō nityō nīlajīmūtasannibhaḥ || 92 ||
kalākṣayaśca sarvajñaḥ kamalārūpatatparaḥ |
hr̥ṣīkēśaḥ pītavāsā vasudēvapriyātmajaḥ || 93 ||
nandagōpakumārāryō navanītāśanō vibhuḥ |
purāṇaḥ puruṣaśrēṣṭhaḥ śaṅkhapāṇiḥ suvikramaḥ || 94 ||
aniruddhaścakradharaḥ śārṅgapāṇiścaturbhujaḥ |
gadādharaḥ surārtighnō gōvindō nandakāyudhaḥ || 95 ||
br̥ndāvanacaraḥ śaurirvēṇuvādyaviśāradaḥ |
tr̥ṇāvartāntakō bhīmasāhasō bahuvikramaḥ || 96 ||
śakaṭāsurasaṁhārī bakāsuravināśanaḥ |
dhēnukāsurasaṁhārī pūtanārirnr̥kēsarī || 97 ||
pitāmahō gurussākṣī pratyagātmā sadāśivaḥ |
apramēyaḥ prabhuḥ prājñō:’pratarkyaḥ svapnavardhanaḥ || 98 ||
dhanyō mānyō bhavō bhāvō dhīraḥ śāntō jagadguruḥ |
antaryāmīśvarō divyō daivajñō dēvasaṁstutaḥ || 99 ||
kṣīrābdhiśayanō dhātā lakṣmīvān lakṣmaṇāgrajaḥ |
dhātrīpatiramēyātmā candraśēkharapūjitaḥ || 100 ||
lōkasākṣī jagaccakṣuḥ puṇyacāritrakīrtanaḥ |
kōṭimanmathasaundaryō jaganmōhanavigrahaḥ || 101 ||
mandasmitatanurgōpagōpikāparivēṣṭitaḥ |
phullāravindanayanaścāṇūrāndhraniṣūdanaḥ || 102 ||
indīvaradalaśyāmō barhibarhāvataṁsakaḥ |
muralīninadāhlādō divyamālāmbarāvr̥taḥ || 103 ||
sukapōlayugaḥ subhrūyugalaḥ sulalāṭakam |
kambugrīvō viśālākṣō lakṣmīvāñchubhalakṣaṇaḥ || 104 ||
pīnavakṣāścaturbāhuścaturmūrtistrivikramaḥ |
kalaṅkarahitaḥ śuddhō duṣṭaśatrunibarhaṇaḥ || 105 ||
kirīṭakuṇḍaladharaḥ kaṭakāṅgadamaṇḍitaḥ |
mudrikābharaṇōpētaḥ kaṭisūtravirājitaḥ || 106 ||
mañjīrarañjitapadaḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ |
vinyastapādayugalō divyamaṅgalavigrahaḥ || 107 ||
gōpikānayanānandaḥ pūrṇacandranibhānanaḥ |
samastajagadānandaḥ sundarō lōkanandanaḥ || 108 ||
yamunātīrasañcārī rādhāmanmathavaibhavaḥ |
gōpanārīpriyō dāntō gōpīvastrāpahārakaḥ || 109 ||
śr̥ṅgāramūrtiḥ śrīdhāmā tārakō mūlakāraṇam |
sr̥ṣṭisaṁrakṣaṇōpāyaḥ krūrāsuravibhañjanaḥ || 110 ||
narakāsurasaṁhārī murārirvairimardanaḥ |
āditēyapriyō daityabhīkarō yaduśēkharaḥ || 111 ||
jarāsandhakuladhvaṁsī kaṁsārātiḥ suvikramaḥ |
puṇyaślōkaḥ kīrtanīyō yādavēndrō jagannutaḥ || 112 ||
rukmiṇīramaṇaḥ satyabhāmājāmbavatīpriyaḥ |
mitravindānāgnajitīlakṣmaṇāsamupāsitaḥ || 113 ||
sudhākarakulē jātō:’nantaḥ prabalavikramaḥ |
sarvasaubhāgyasampannō dvārakāpaṭ-ṭaṇasthitaḥ || 114 ||
bhadrāsūryasutānāthō līlāmānuṣavigrahaḥ |
sahasraṣōḍaśastrīśō bhōgamōkṣaikadāyakaḥ || 115 ||
vēdāntavēdyaḥ saṁvēdyō vaidyō brahmāṇḍanāyakaḥ |
gōvardhanadharō nāthaḥ sarvajīvadayāparaḥ || 116 ||
mūrtimān sarvabhūtātmā ārtatrāṇaparāyaṇaḥ |
sarvajñaḥ sarvasulabhaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ || 117 ||
ṣaḍguṇaiśvaryasampannaḥ pūrṇakāmō dhurandharaḥ |
mahānubhāvaḥ kaivalyadāyakō lōkanāyakaḥ || 118 ||
ādimadhyāntarahitaḥ śuddhasāttvikavigrahaḥ |
asamānaḥ samastātmā śaraṇāgatavatsalaḥ || 119 ||
utpattisthitisaṁhārakāraṇaṁ sarvakāraṇam |
gambhīraḥ sarvabhāvajñaḥ saccidānandavigrahaḥ || 120 ||
viṣvaksēnaḥ satyasandhaḥ satyavāk satyavikramaḥ |
satyavrataḥ satyarataḥ satyadharmaparāyaṇaḥ || 121 ||
āpannārtipraśamanaḥ draupadīmānarakṣakaḥ |
kandarpajanakaḥ prājñō jagannāṭakavaibhavaḥ || 122 ||
bhaktivaśyō guṇātītaḥ sarvaiśvaryapradāyakaḥ |
damaghōṣasutadvēṣī bāṇabāhuvikhaṇḍanaḥ || 123 ||
bhīṣmabhaktipradō divyaḥ kauravānvayanāśanaḥ |
kauntēyapriyabandhuśca pārthasyandanasārathiḥ || 124 ||
nārasiṁhō mahāvīraḥ stambhajātō mahābalaḥ |
prahlādavaradaḥ satyō dēvapūjyō:’bhayaṅkaraḥ || 125 ||
upēndra indrāvarajō vāmanō balibandhanaḥ |
gajēndravaradaḥ svāmī sarvadēvanamaskr̥taḥ || 126 ||
śēṣaparyaṅkaśayanō vainatēyarathō jayī |
avyāhatabalaiśvaryasampannaḥ pūrṇamānasaḥ || 127 ||
yōgīśvarēśvaraḥ sākṣī kṣētrajñō jñānadāyakaḥ |
yōgihr̥tpaṅkajāvāsō yōgamāyāsamanvitaḥ || 128 ||
nādabindukalātītaścaturvargaphalapradaḥ |
suṣumnāmārgasañcārī dēhasyāntarasaṁsthitaḥ || 129 ||
dēhēndriyamanaḥprāṇasākṣī cētaḥprasādakaḥ |
sūkṣmaḥ sarvagatō dēhī jñānadarpaṇagōcaraḥ || 130 ||
tattvatrayātmakō:’vyaktaḥ kuṇḍalī samupāśritaḥ |
brahmaṇyaḥ sarvadharmajñaḥ śāntō dāntō gataklamaḥ || 131 ||
śrīnivāsaḥ sadānandō viśvamūrtirmahāprabhuḥ |
sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt || 132 ||
samastabhuvanādhāraḥ samastaprāṇarakṣakaḥ |
samastassarvabhāvajñō gōpikāprāṇavallabhaḥ || 133 ||
nityōtsavō nityasaukhyō nityaśrīrnityamaṅgalam |
vyūhārcitō jagannāthaḥ śrīvaikuṇṭhapurādhipaḥ || 134 ||
pūrṇānandaghanībhūtō gōpavēṣadharō hariḥ |
kalāpakusumaśyāmaḥ kōmalaḥ śāntavigrahaḥ || 135 ||
gōpāṅganāvr̥tō:’nantō br̥ndāvanasamāśrayaḥ |
vēṇunādarataḥ śrēṣṭhō dēvānāṁ hitakārakaḥ || 136 ||
jalakrīḍāsamāsaktō navanītasya taskaraḥ |
gōpālakāminījāraścōrajāraśikhāmaṇiḥ || 137 ||
parañjyōtiḥ parākāśaḥ parāvāsaḥ parisphuṭaḥ |
aṣṭādaśākṣarō mantrō vyāpakō lōkapāvanaḥ || 138 ||
saptakōṭimahāmantraśēkharō dēvaśēkharaḥ |
vijñānajñānasandhānastējōrāśirjagatpatiḥ || 139 ||
bhaktalōkaprasannātmā bhaktamandāravigrahaḥ |
bhaktadāridryaśamanō bhaktānāṁ prītidāyakaḥ || 140 ||
bhaktādhīnamanāḥ pūjyō bhaktalōkaśivaṅkaraḥ |
bhaktābhīṣṭapradaḥ sarvabhaktāghaughanikr̥ntakaḥ || 141 ||
apārakaruṇāsindhurbhagavān bhaktatatparaḥ || 142 ||
FAQs in English
1. What is Shri Gopal Sahasranama Stotram?
Shri Gopal Sahasranama Stotram is a sacred hymn dedicated to Lord Krishna in His loving Gopal form. “Sahasranama” means one thousand names. This stotram contains the divine names of Lord Krishna, each representing His qualities, leelas, compassion, protection, beauty, and spiritual greatness.
2. What is the meaning of Shri Gopal Sahasranama Stotram?
The meaning of Shri Gopal Sahasranama Stotram is the devotional remembrance of Lord Krishna through His thousand sacred names. Each name reflects a divine aspect of Krishna, such as Gopal, Govind, Madhav, Damodar, Vasudev, and Murari. It helps devotees understand Krishna as the protector, guide, friend, and supreme source of love and bliss.
3. When should Shri Gopal Sahasranama Stotram be recited?
Shri Gopal Sahasranama Stotram can be recited daily with devotion. Auspicious days include Ekadashi, Thursday, Wednesday, Purnima, Janmashtami, Gita Jayanti, and other Krishna-related festivals. Morning time after bathing is considered ideal, but devotees may recite it whenever they can sit with a peaceful and focused mind.
4. How to recite Shri Gopal Sahasranama Stotram?
To recite Shri Gopal Sahasranama Stotram, sit in a clean place facing east or north. Place an image or idol of Lord Krishna, light a diya, offer tulsi leaves, flowers, milk, butter, mishri, or sattvik bhog. Chant “Om Namo Bhagavate Vasudevaya” or the Hare Krishna mantra before beginning, then recite the stotram with devotion and attention.
5. What are the benefits of Shri Gopal Sahasranama Stotram?
The benefits of Shri Gopal Sahasranama Stotram include mental peace, devotion to Lord Krishna, emotional stability, family harmony, positive energy, spiritual growth, and inner strength. Devotees believe that regular recitation brings Krishna’s grace, removes negativity, supports child welfare, and helps the mind become more loving, calm, and devotional.
LORD KRISHNA | श्री कृष्ण
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम्
श्री कृष्ण चालीसा
श्री कृष्णाष्टकम्
संतान गोपाल मंत्र
कृष्ण मंत्र
श्री कृष्ण आरती
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