Solah(16) Somvar Vrat Katha in Hindi PDF | सोलह (षोडश) 16 सोमवार व्रत कथा
सोलह सोमवार व्रत कथा: अर्थ, विधि, समय और लाभ
1. Introduction
सोलह सोमवार व्रत भगवान शिव को समर्पित एक लोकप्रिय और श्रद्धापूर्ण व्रत है। इसे लगातार 16 सोमवार तक किया जाता है। हिंदू परंपरा में सोमवार का दिन भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक, मंत्र जाप और व्रत के लिए विशेष माना जाता है। सोलह सोमवार व्रत में भक्त भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं और व्रत कथा सुनते या पढ़ते हैं।
यह व्रत केवल विवाह या मनोकामना पूर्ति से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, संयम, धैर्य और आत्मनियंत्रण की साधना भी है। कई भक्त इसे मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, वैवाहिक जीवन में संतुलन, योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और शिव कृपा के लिए करते हैं। परंपरागत रूप से सोलह सोमवार व्रत को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने वाला विशेष व्रत माना गया है।
2. सोलह सोमवार व्रत कथा क्या है?
सोलह सोमवार व्रत कथा वह धार्मिक कथा है जिसे सोलह सोमवार व्रत के दौरान पूजा के बाद पढ़ा या सुना जाता है। “सोलह सोमवार” का अर्थ है लगातार 16 सोमवार तक भगवान शिव का व्रत और पूजन करना। इस व्रत में भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास रखते हैं, शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाते हैं, बेलपत्र अर्पित करते हैं और भगवान शिव से अपनी मनोकामना की प्रार्थना करते हैं।
सोलह सोमवार व्रत कथा भक्त को यह समझाती है कि सच्ची श्रद्धा, नियम, विश्वास और धैर्य से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। कथा में शिव भक्ति, व्रत के महत्व, संयम और ईश्वर पर भरोसे का संदेश दिया जाता है। इस व्रत की पूजा विधि में शिव पूजन के बाद कथा पढ़ना या सुनना महत्वपूर्ण माना जाता है।
Solah(16) Somvar Vrat Katha
सोलह (षोडश) 16 सोमवार व्रत कथा
एक बार भगवान शिव जी पार्वती जी के साथ भ्रमण करते हुए मृत्युलोक की अमरावती नगर में पहुँचे. उस नगर के राजा ने भगवान शिव का एक विशाल मंदिर बनवा रखा था.शिव और पार्वती उस मंदिर में रहने लगे.एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ! आज मेरी चौसर खेलने की इच्छा हो रही है.’ पार्वती की इच्छा जानकर शिव पार्वती के साथ चौसर खेलने बैठ गए. खेल प्रारंभ होते ही उस मंदिर का पुजारी वहां आ गया. माता पार्वती जी ने पुजारी जी से पूछा – कि हे पुजारी जी! यह बताइए कि इस बाज़ी में किसकी जीत होगी?
तो ब्राह्मण ने कहा – कि महादेव जी की. परन्तु चौसर में शिवजी की पराजय हुई और माता पार्वती जी जीत गईं. तब ब्राह्मण को उन्होंने झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी होने का श्राप दिया. शिव और पार्वती उस मंदिर से कैलाश पर्वत लौट गए. पार्वती जी के श्राप के कारण पुजारी कोढ़ी हो गया. नगर के स्त्री-पुरुष उस पुजारी की परछाई से भी दूर-दूर रहने लगे. कुछ लोगों ने राजा से पुजारी के कोढ़ी हो जाने की शिकायत की तो राजा ने किसी पाप के कारण पुजारी के कोढ़ी हो जाने का विचार कर उसे मंदिर से निकलवा दिया. उसकी जगह दूसरे ब्राह्मण को पुजारी बना दिया. कोढ़ी पुजारी मंदिर के बाहर बैठकर भिक्षा माँगने लगा.
कई दिनों के पश्चात स्वर्गलोक की कुछ अप्सराएं, उस मंदिर में पधारीं, और उसे देखकर कारण पूछा. पुजारी ने निःसंकोच पुजारी ने उन्हें भगवान शिव और पार्वतीजी के चौसर खेलने और पार्वतीजी के शाप देने की सारी कहानी सुनाई. तब अप्सराओं ने पुजारी से सोलह सोमवार का विधिवत व्रत्र रखने को कहा.
पुजारी द्वारा पूजन विधि पूछने पर अप्सराओं ने कहा- ‘सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानादि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर उसके तीन अंग बनाना.फिर घी का दीपक जलाकर गुड़, नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फूल,जनेऊ का जोड़ा लेकर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना.पूजा के बाद तीन अंगों में एक अंग भगवान शिव को अर्पण करके, एक आप ग्रहण करें. शेष दो अंगों को भगवान का प्रसाद मानकर वहां उपस्थित स्त्री, पुरुषों और बच्चों को बाँट देना. इस तरह व्रत करते हुए जब सोलह सोमवार बीत जाएँ तो सत्रहवें सोमवार को एक पाव आटे की बाटी बनाकर, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना.फिर भगवान शिव को भोग लगाकर वहाँ उपस्थित स्त्री, पुरुष और बच्चों को प्रसाद बाँट देना. इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने और व्रतकथा सुनने से भगवान शिव तुम्हारे कोढ़ को नष्ट करके तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूरी कर देंगे. इतना कहकर अप्सराएं स्वर्गलोक को चली गईं.
पुजारी ने अप्सराओं के कथनानुसार सोलह सोमवार का विधिवत व्रत किया. फलस्वरूप भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका कोढ़ नष्ट हो गया. राजा ने उसे फिर मंदिर का पुजारी बना दिया. वह मंदिर में भगवान शिव की पूजा करता आनंद से जीवन व्यतीत करने लगा.
कुछ दिनों बाद पुन: पृथ्वी का भ्रमण करते हुए भगवान शिव और पार्वती उस मंदिर में पधारे. स्वस्थ पुजारी को देखकर पार्वती ने आश्चर्य से उसके रोगमुक्त होने का कारण पूछा तो पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत करने की सारी कथा सुनाई.
पार्वती जी भी व्रत की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने पुजारी से इसकी विधि पूछकर स्वयं सोलह सोमवार का व्रत प्रारंभ किया. पार्वती जी उन दिनों अपने पुत्र कार्तिकेय के नाराज होकर दूर चले जाने से बहुत चिन्तित रहती थीं. वे कार्तिकेय को लौटा लाने के अनेक उपाय कर चुकी थीं, लेकिन कार्तिकेय लौटकर उनके पास नहीं आ रहे थे. सोलह सोमवार का व्रत करते हुए पार्वती ने भगवान शिव से कार्तिकेय के लौटने की मनोकामना की. व्रत समापन के तीसरे दिन सचमुच कार्तिकेय वापस लौट आए. कार्तिकेय ने अपने हृदय-परिवर्तन के संबंध में पार्वतीजी से पूछा- ‘हे माता! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया था, जिससे मेरा क्रोध नष्ट हो गया और मैं वापस लौट आया?’ तब पार्वतीजी ने कार्तिकेय को सोलह सोमवार के व्रत की कथा कह सुनाई.
कार्तिकेय अपने एक ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त के परदेस चले जाने से बहुत दुखी थे. उसको वापस लौटाने के लिए कार्तिकेय ने सोलह सोमवार का व्रत करते हुए ब्रह्मदत्त के वापस लौट आने की कामना प्रकट की. व्रत के समापन के कुछ दिनों के बाद मित्र लौट आया. ब्राह्मण ने कार्तिकेय से कहा- ‘प्रिय मित्र! तुमने ऐसा कौन-सा उपाय किया था जिससे परदेस में मेरे विचार एकदम परिवर्तित हो गए और मैं तुम्हारा स्मरण करते हुए लौट आया?’ कार्तिकेय ने अपने मित्र को भी सोलह सोमवार के व्रत की कथा-विधि सुनाई. ब्राह्मण मित्र व्रत के बारे में सुनकर बहुत खुश हुआ. उसने भी व्रत किया.
सोलह सोमवार व्रत का समापन करने के बाद ब्रह्मदत्त विदेश यात्रा पर निकला. वहां नगर के राजा राजा हर्षवर्धन की बेटी राजकुमारी गुंजन का स्वयंवर हो रहा था. वहां के राजा ने प्रतिज्ञा की थी कि एक हथिनी यह माला जिसके गले में डालेगी, वह अपनी पुत्री का विवाह उसी से करेगा.
ब्राह्मण भी उत्सुकता वश महल में चला गया. वहां कई राज्यों के राजकुमार बैठे थे. तभी एक सजी-धजी हथिनी सूँड में जयमाला लिए वहां आई. हथिनी ने ब्राह्मण के गले में जयमाला डाल दी. फलस्वरूप राजकुमारी का विवाह ब्राह्मण से हो गया.
एक दिन उसकी पत्नी ने पूछा- ‘हे प्राणनाथ! आपने कौन-सा शुभकार्य किया था जो उस हथिनी ने राजकुमारों को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाल दी.’ ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की विधि बताई. अपने पति से सोलह सोमवार का महत्व जानकर राजकुमारी ने पुत्र की इच्छा से सोलह सोमवार का व्रत किया. निश्चित समय पर भगवान शिव की अनुकम्पा से राजकुमारी के एक सुंदर, सुशील व स्वस्थ पुत्र पैदा हुआ. पुत्र का नामकरण गोपाल के रूप में हुआ.
बड़ा होने पर पुत्र गोपाल ने भी मां से एक दिन प्रश्न किया कि मैंने तुम्हारे ही घर में जन्म लिया इसका क्या कारण है. माता गुंजन ने पुत्र को सोलह सोमवार व्रत की जानकारी दी. व्रत का महत्व जानकर गोपाल ने भी व्रत करने का संकल्प किया. गोपाल जब सोलह वर्ष का हुआ तो उसने राज्य पाने की इच्छा से सोलह सोमवार का विधिवत व्रत किया. व्रत समापन के बाद गोपाल घूमने के लिए समीप के नगर में गया. वहां के वृद्ध राजा ने गोपाल को पसंद किया और बहुत धूमधाम से आपनी पुत्री राजकुमारी मंगला का विवाह गोपाल के साथ कर दिया. सोलह सोमवार के व्रत करने से गोपाल महल में पहुँचकर आनंद से रहने लगा.
दो वर्ष बाद वृद्ध राजा का निधन हो गया, तो गोपाल को उस नगर का राजा बना दिया गया. इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने से गोपाल की राज्य पाने की इच्छा पूर्ण हो गई. राजा बनने के बाद भी वह विधिवत सोलह सोमवार का व्रत करता रहा. व्रत के समापन पर सत्रहवें सोमवार को गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला से कहा कि व्रत की सारी सामग्री लेकर वह समीप के शिव मंदिर में पहुंचे.
पति की आज्ञा का उलघंन करके, सेवकों द्वारा पूजा की सामग्री मंदिर में भेज दी. स्वयं मंदिर नहीं गई. जब राजा ने भगवान शिव की पूजा पूरी की तो आकाशवाणी हुई- ‘हे राजन्! तेरी रानी ने सोलह सोमवार व्रत का अनादर किया है. सो रानी को महल से निकाल दे, नहीं तो तेरा सब वैभव नष्ट हो जाएगा. आकाशवाणी सुनकर उसने तुरंत महल में पहुंचकर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि रानी को दूर किसी नगर में छोड़ आओ.´ सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए उसे तत्काल उसे घर से निकाल दिया. रानी भूखी-प्यासी उस नगर में भटकने लगी. रानी को उस नगर में एक बुढ़िया मिली. वह बुढ़िया सूत कातकर बाजार में बेचने जा रही थी, लेकिन उस बुढ़िया से सूत उठ नहीं रहा था. बुढ़िया ने रानी से कहा- ‘बेटी! यदि तुम मेरा सूत उठाकर बाजार तक पहुंचा दो और सूत बेचने में मेरी मदद करो तो मैं तुम्हें धन दूंगी.’
रानी ने बुढ़िया की बात मान ली. लेकिन जैसे ही रानी ने सूत की गठरी को हाथ लगाया, तभी जोर की आंधी चली और गठरी खुल जाने से सारा सूत आंधी में उड़ गया. बुढ़िया ने उसे फटकारकर भागा दिया. रानी चलते-चलते नगर में एक तेली के घर पहुंची. उस तेली ने तरस खाकर रानी को घर में रहने के लिए कह दिया लेकिन तभी भगवान शिव के प्रकोप से तेली के तेल से भरे मटके एक-एक करके फूटने लगे. तेली ने भी भागा दिया.
भूखी-प्यास से व्याकुल रानी वहां से आगे की ओर चल पड़ी. रानी ने एक नदी पर जल पीकर अपनी प्यास शांत करनी चाही तो नदी का जल उसके स्पर्श से सूख गया. अपने भाग्य को कोसती हुई रानी आगे चल दी.चलते-चलते रानी एक जंगल में पहुंची. उस जंगल में एक तालाब था. उसमें निर्मल जल भरा हुआ था. निर्मल जल देखकर रानी की प्यास तेज हो गई. जल पीने के लगी रानी ने तालाब की सीढ़ियां उतरकर जैसे ही जल को स्पर्श किया, तभी उस जल में असंख्य कीड़े उत्पन्न हो गए. रानी ने दु:खी होकर उस गंदे जल को पीकर अपनी प्यास शांत की.
रानी ने एक पेड़ की छाया में बैठकर कुछ देर आराम करना चाहा तो उस पेड़ के पत्ते पलभर में सूखकर बिखर गए. रानी दूसरे पेड़ के नीचे जाकर बैठी जिस पेड़ के नीचे बैठती वही सुख जाता.
वन और सरोवर की यह दशा देखकर वहां के ग्वाले बहुत हैरान हुए. ग्वाले रानी को समीप के मंदिर में पुजारी जी के पास ले गए. रानी के चेहरे को देखकर ही पुजारी जान गए कि रानी अवश्य किसी बड़े घर की है. भाग्य के कारण दर-दर भटक रही है.
पुजारी ने रानी से कहा- ‘पुत्री! तुम कोई चिंता नहीं करो. मेरे साथ इस मंदिर में रहो. कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जाएगा.’ पुजारी की बातों से रानी को बहुत सांत्वना मिली. रानी उस मंदिर में रहने लगी, रानी भोजन बनाती तो सब्जी जल जाती, आटे में कीड़े पड़ जाते. जल से बदबू आने लगती. पुजारी भी रानी के दुर्भाग्य से बहुत चिंतित होते हुए बोले- ‘हे पुत्री! अवश्य ही तुझसे कोई अनुचित काम हुआ है जिसके कारण देवता तुझसे नाराज हैं और उनकी नाराजगी के कारण ही तुम्हारी यह दशा हुई है. पुजारी की बात सुनकर रानी ने अपने पति के आदेश पर मंदिर में न जाकर, शिव की पूजा नहीं करने की सारी कथा सुनाई.
पुजारी ने कहा- ‘अब तुम कोई चिंता नहीं करो.कल सोमवार है और कल से तुम सोलह सोमवार के व्रत करना शुरू कर दो. भगवान शिव अवश्य तुम्हारे दोषों को क्षमा कर देंगे.’ पुजारी की बात मानकर रानी ने सोलह सोमवार के व्रत प्रारंभ कर दिए. रानी सोमवार का व्रत करके शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की तथा व्रतकथा सुनने लगी. जब रानी ने सत्रहवें सोमवार को विधिवत व्रत का समापन किया तो उधर उसके पति राजा के मन में रानी की याद आई. राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को रानी को ढूँढकर लाने के लिए भेजा. रानी को ढूँढते हुए सैनिक मंदिर में पहुँचे और रानी से लौटकर चलने के लिए कहा. पुजारी ने सैनिकों से मना कर दिया और सैनिक निराश होकर लौट गए. उन्होंने लौटकर राजा को सारी बात बताईं.
राजा स्वयं उस मंदिर में पुजारी के पास पहुँचे और रानी को महल से निकाल देने के कारण पुजारी जी से क्षमा माँगी. पुजारी ने राजा से कहा- ‘यह सब भगवान शिव के प्रकोप के कारण हुआ है. इतना कहकर रानी को विदा किया.
राजा के साथ रानी महल में पहुँची. महल में बहुत खुशियाँ मनाई गईं. पूरे नगर को सजाया गया. राजा ने ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और धन का दान दिया. नगर में निर्धनों को वस्त्र बाँटे गए.
रानी सोलह सोमवार का व्रत करते हुए महल में आनंदपूर्वक रहने लगी. भगवान शिव की अनुकम्पा से उसके जीवन में सुख ही सुख भर गए.
सोलह सोमवार के व्रत करने और कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में किसी तरह की कमी नहीं होती है. स्त्री-पुरुष आनंदपूर्वक जीवन-यापन करते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं.
4. सोलह सोमवार व्रत कब और कैसे करें?
सोलह सोमवार व्रत किसी भी शुभ सोमवार से शुरू किया जा सकता है। बहुत से भक्त इसे सावन के सोमवार से आरंभ करना शुभ मानते हैं, क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव की उपासना से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष या किसी भी मनोकामना के संकल्प के साथ इसे शुरू किया जा सकता है। सोमवार का दिन शिव पूजा के लिए विशेष माना जाता है और सावन सोमवार में शिवलिंग पर अभिषेक, बेलपत्र और मंत्र जाप की परंपरा प्रचलित है।
सोलह सोमवार व्रत करने की सरल विधि इस प्रकार है:
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान को साफ करें और भगवान शिव, माता पार्वती या शिवलिंग के सामने दीपक जलाएं। भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, सफेद फूल, धतूरा, फल और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें और सोलह सोमवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और भगवान शिव से अपने परिवार, स्वास्थ्य, मन की शांति और शुभ जीवन की प्रार्थना करें।
व्रत में कुछ लोग फलाहार करते हैं, कुछ केवल एक समय भोजन लेते हैं और कुछ अपनी शक्ति के अनुसार उपवास रखते हैं। व्रत शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि मन को संयमित करने के लिए होता है। इसलिए स्वास्थ्य, आयु और परिस्थिति के अनुसार व्रत करना चाहिए।
5. सोलह सोमवार व्रत के लाभ
सोलह सोमवार व्रत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भक्त के जीवन में श्रद्धा, धैर्य, अनुशासन और मानसिक स्थिरता लाता है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत विवाह में आ रही रुकावटों, योग्य जीवनसाथी की इच्छा, वैवाहिक जीवन में शांति, पारिवारिक सुख और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा होने के कारण इसे दांपत्य सुख और संबंधों में संतुलन से भी जोड़ा जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से सोलह सोमवार व्रत व्यक्ति को नियमित पूजा, मंत्र जाप, सात्विक भोजन और सकारात्मक विचारों की ओर ले जाता है। इससे मन में शांति, आत्मविश्वास और ईश्वर पर भरोसा बढ़ता है। जो भक्त तनाव, चिंता, अस्थिरता या जीवन में दिशा की कमी महसूस करते हैं, वे इस व्रत के माध्यम से अपने मन को केंद्रित कर सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल चमत्कारिक फल पाना नहीं है, बल्कि अपने जीवन में भक्ति, संयम, सद्भाव और शिव कृपा का अनुभव करना है।
FAQs in English
1. What is Solah Somvar Vrat Katha?
Solah Somvar Vrat Katha is the sacred story read or heard during the 16 Monday fast dedicated to Lord Shiva. It explains the importance of devotion, faith, discipline and worship of Lord Shiva.
2. What is the meaning of Solah Somvar Vrat?
Solah Somvar Vrat means observing a fast and worshipping Lord Shiva for 16 consecutive Mondays. It represents devotion, self-discipline, patience and faith in Lord Shiva’s blessings.
3. When should Solah Somvar Vrat be started?
Solah Somvar Vrat can be started on any auspicious Monday. Many devotees prefer starting it during the month of Sawan, as this period is considered especially sacred for Lord Shiva worship.
4. How should Solah Somvar Vrat be observed?
Devotees usually wake up early, bathe, wear clean clothes, worship Lord Shiva, offer water, milk, bilva leaves and flowers, chant “Om Namah Shivaya” and read or listen to the Solah Somvar Vrat Katha.
5. What are the benefits of Solah Somvar Vrat?
Solah Somvar Vrat is believed to bring mental peace, marital harmony, suitable life partner blessings, family happiness, discipline, spiritual focus and fulfilment of sincere wishes through Lord Shiva’s grace.
Lord Shiva
- Maha Mrityunjaya Mantra
- Shiva Aarti
- Shiva Rudrashtakam
- Shiv Tandav Stotram
- Lingashtakam
- ChandraSekhara Ashtakam
- Nirvana Shatakam
- Shivashtakam
- Shiva Kavach
- Bilvashtakam
- Uma Maheswara Stotram
- Shiva Ashtottara Sata Namavali
- 108 Names of Lord Shiva
- Shiva Panchakshari Stotram
- Somvar Vrat Katha
- Maha Shivaratri Puja Vidhi
- Pradosh Vrat Katha
Shiva Chalisa in Hindi/Bengali/Gujrati/Marathi/English
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Shiv Chalisa in Gujarati
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Shiva Chalisa in Hindi Lyrics PDF
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शिव चालीसा हिंदी में अनुवाद सहित
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