शिव तांडव स्तोत्र | Shiva Tandav Stotram in Hindi Lyrics PDF
शिव तांडव स्तोत्र: अर्थ, पाठ विधि, समय और लाभ
1. Introduction
शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की सबसे प्रभावशाली और ऊर्जावान स्तुतियों में से एक है। यह स्तोत्र भगवान शिव के तांडव रूप, उनकी दिव्य शक्ति, सौंदर्य, वैराग्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वर्णन करता है। हिंदू परंपरा में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है और श्रद्धा के साथ इसका पाठ करने से मन में शक्ति, साहस और भक्ति की भावना बढ़ती है।
शिव तांडव स्तोत्र की रचना रावण द्वारा की गई मानी जाती है। कथा के अनुसार, जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति की, तब यह महान स्तोत्र प्रकट हुआ। इसकी भाषा संस्कृत है और इसके शब्दों में एक विशेष लय, गति और शक्ति अनुभव होती है। यही कारण है कि इसे सुनने या पढ़ने से भक्त के मन में भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा जागती है।
2. शिव तांडव स्तोत्र क्या है?
शिव तांडव स्तोत्र एक संस्कृत स्तुति है, जिसमें भगवान शिव के तांडव नृत्य का सुंदर वर्णन किया गया है। “तांडव” भगवान शिव का दिव्य नृत्य माना जाता है, जो सृष्टि, संहार, परिवर्तन और पुनर्निर्माण का प्रतीक है। “स्तोत्र” का अर्थ होता है ईश्वर की स्तुति या प्रशंसा।
इस स्तोत्र में भगवान शिव के जटाओं में बहती गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, गले में सर्प, हाथ में डमरू, तीसरे नेत्र और भस्म से सुशोभित स्वरूप का वर्णन मिलता है। यह स्तोत्र केवल भगवान शिव की प्रशंसा नहीं करता, बल्कि शिव तत्व की गहराई को भी समझाता है।
Shiva Tandava Stotram in Hindi Lyrics
शिव तांडव स्तोत्र हिंदी में अनुवाद सहित
जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जिन शिव जी की सघन जटारूप वन से प्रवाहित हो गंगा जी की धारायं उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, जिनके गले में बडे एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शीश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अंनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जो पर्वतराजसुता(पार्वती जी) के विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त कब आनंदित होगा
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूँ जो सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं, जिनके जाटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समुहरूपकेसर के कातिं से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभुषित हैं।
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
इंद्रादि समस्त देवताओं के सिर से सुसज्जित पुष्पों की धूलिराशि से धूसरित पादपृष्ठ वाले सर्पराजों की मालाओं से विभूषित जटा वाले प्रभु हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पुज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्दी प्रदान करें।
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर है ( यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
जिनका कण्ठ नवीन मेंघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के सामान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पनता प्रदान करें।
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खो के काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
जो कल्यानमय, अविनाशि, समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के सहांरक, दक्षयज्ञविध्वसंक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढी हूई प्रचंण अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टूकडों, शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर सामान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥13॥
कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा।
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंदयुक्त हमारेमन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें।
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥15॥
प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ।
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥
इस परम उत्तम शिव ताण्डव स्त्रोत को नित्य पढने या श्रवण करने मात्र से प्राणि पवित्र हो, परंगुरू शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
प्रदोष समय में शिवपुजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोडा आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।
इति श्रीरावण – कृतम् शिव – ताण्दव स्तोत्रम् सम्पूर्णम्
3. शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ
शिव तांडव स्तोत्र का मुख्य अर्थ भगवान शिव की अनंत शक्ति और उनके तांडव स्वरूप की स्तुति है। इसमें भगवान शिव को ऐसे देवता के रूप में दिखाया गया है जो समय, मृत्यु, परिवर्तन और मोक्ष के स्वामी हैं।
इस स्तोत्र का गहरा संदेश यह है कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है। भगवान शिव का तांडव हमें सिखाता है कि पुरानी नकारात्मकता, अहंकार, भय और अज्ञान का अंत जरूरी है, ताकि जीवन में नई ऊर्जा, ज्ञान और शांति आ सके।
सरल शब्दों में, शिव तांडव स्तोत्र हमें बताता है कि भगवान शिव विनाश के देवता होने के साथ-साथ कल्याण, मुक्ति और आत्मशक्ति के भी प्रतीक हैं। जब भक्त श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसके भीतर साहस, स्थिरता और आध्यात्मिक विश्वास बढ़ता है।
4. शिव तांडव स्तोत्र कब और कैसे पढ़ें?
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ सुबह स्नान के बाद या शाम के समय शांत मन से किया जा सकता है। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है, इसलिए इस दिन इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। इसके अलावा प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में भी इसका पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है।
पाठ करने की सरल विधि इस प्रकार है:
सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें। फिर किसी शांत और साफ स्थान पर बैठें। भगवान शिव की प्रतिमा, शिवलिंग या चित्र के सामने दीपक जलाएं। मन को शांत करके कुछ बार “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें। इसके बाद शिव तांडव स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और ध्यान के साथ करें।
यदि संस्कृत उच्चारण कठिन लगे, तो शुरुआत में धीरे-धीरे पढ़ें। आप पहले इसका हिंदी अर्थ समझ सकते हैं और फिर पाठ का अभ्यास कर सकते हैं। पाठ करते समय केवल शब्दों की गति पर ध्यान न दें, बल्कि भाव, श्रद्धा और भगवान शिव के ध्यान पर ध्यान दें।
5. शिव तांडव स्तोत्र के लाभ
शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ मन, विचार और आत्मबल को मजबूत करने वाला माना जाता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो भय, मानसिक तनाव, नकारात्मक विचारों, आत्मविश्वास की कमी या जीवन में बार-बार आने वाली बाधाओं से परेशान हैं।
श्रद्धा के साथ शिव तांडव स्तोत्र पढ़ने से मन में साहस, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा आती है। यह भक्त को भगवान शिव के तेज, वैराग्य और शक्ति से जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से नकारात्मकता कम होती है, मन शांत होता है और व्यक्ति के भीतर निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से शिव तांडव स्तोत्र व्यक्ति को अहंकार छोड़ने, डर से ऊपर उठने और जीवन के बदलावों को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। यह स्तोत्र केवल इच्छा पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, भक्ति और आंतरिक परिवर्तन के लिए भी पढ़ा जाता है।
FAQs in English
1. What is Shiv Tandav Stotram?
Shiv Tandav Stotram is a powerful Sanskrit hymn dedicated to Lord Shiva. It describes Lord Shiva’s cosmic Tandava dance, divine energy, fierce beauty and supreme spiritual power.
2. What is the meaning of Shiv Tandav Stotram?
The meaning of Shiv Tandav Stotram is the praise of Lord Shiva’s Tandava form. It symbolizes transformation, destruction of negativity, divine strength, cosmic rhythm and spiritual awakening.
3. When should Shiv Tandav Stotram be recited?
Shiv Tandav Stotram can be recited in the morning or evening. Mondays, Pradosh Vrat, Masik Shivratri, Mahashivratri and the month of Sawan are considered especially auspicious for its recitation.
4. How should Shiv Tandav Stotram be recited?
It should be recited after bathing, in a clean and peaceful place, with devotion and focus. You can light a diya, chant “Om Namah Shivaya” and then recite the stotram slowly with a calm mind.
5. What are the benefits of Shiv Tandav Stotram?
The regular recitation of Shiv Tandav Stotram is believed to bring courage, mental strength, spiritual focus, protection from negativity, inner peace and deeper devotion toward Lord Shiva.
Shiv Tandav Stotram in Hindi/Gujarati/English
Shiva Tandav Stotram in Gujarati PDF | શિવ તાંડવ સ્તોત્રમ્
Shiva Tandav Stotram in Hindi PDF | शिव तांडव स्तोत्र
Shiva Tandav Stotram in English PDF
Lord Shiva
- Maha Mrityunjaya Mantra
- Shiva Aarti
- Shiva Rudrashtakam
- Shiv Tandav Stotram
- Lingashtakam
- ChandraSekhara Ashtakam
- Nirvana Shatakam
- Shivashtakam
- Shiva Kavach
- Bilvashtakam
- Shiva Ashtottara Sata Namavali
- 108 Names of Lord Shiva
- Shiva Panchakshari Stotram
- Somvar Vrat Katha
- Maha Shivaratri Puja Vidhi
- Pradosh Vrat Katha
Shiva Chalisa in Hindi/Bengali/Gujrati/Marathi/English
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शिव चालीसा हिंदी में अनुवाद सहित
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